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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात

"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

Wednesday, January 27, 2010

मम्मी-पापा

मेरी मम्मी सबसे अच्छी
मुझे खूब प्यार वो करती
पापा मेरे और भी अच्छे
संग मेरे वो रोज खेलते
सुबह-सवेरे उठ कर आते
प्यार से मुझको दोनों जगाते
मम्मी मेरी खाना बनाती
पापा मुझे तैयार कराते
खुशी-खुशी मैं बस्ता लेता
पापा मुझको छोड़ कर आते
स्कूल से जब मैं पढ़ कर आता
मम्मी से फिर मैं खाना खाता
होम-वर्क मैं अपना करके
गोदी में मम्मी की सो जाता
शाम को जब पापा हैं आते
पार्क में मुझको खेल खिलाते
रात को सोने से पहले मैं
अगले दिन का बैग लगाता
तुम भी मुझ जैसे बन जाओ
पापा-मम्मी के प्यारे बन जाओ
दोनों जब मुझे प्यार हैं करते
दुनिया से न्यारे हैं लगते

(हिन्द युग्म पर प्रकाशित)

Thursday, January 07, 2010

"ज़ीवन के रण से तू न भाग"


प्रज्जवलित कर उर की मशाल,
कुछ ऐसा कर उन्नत हो भाल,
जीवन के रण से तू न भाग,
कर सामना कर सीना विशाल ।

चाहे व्यथित हो मन तेरा,
हो चाहे चेतना अभिवंचित,
लक्ष्य पाने का अभिमाद,
न खोना तू कभी किसी हाल ।

हो कंटकी कितनी भी राहें,
रखना फैलाये तू बाहें,
नहीं करना पग अपने पीछे,
चाहे कर दे तुझे भस्म ज्वाल ।

हर दिशा नई मंजिल बना,
अवसर से वंचित मत रहना,
करते रहना तू विक्रमण,
नहीं काम आयेगा फिर विकाल ।

Tuesday, November 10, 2009

"कौन आज प्यार की गुहार है लगा रहा"

हादसों के शहर में है कौन आज गा रहा,
कौन आज प्यार की गुहार है लगा रहा।

बंट चुका ये शहर आज नफरतों की आग से,
गीत सारे गा रहे हैं अपने-अपने राग के,
कौन आज शहर में नई तरंग ला रहा ।

घर के चार कोने, हर कोने का अलग पता,
सबने मुँह फुलाये हैं, न जाने किसकी है खता,
अपना ही अपनों को जहर है पिला रहा।

राम नाम गा रहा अर्थी के संग जो जा रहा,
शमशान से निकलते ही पुरानी राह आ रहा,
सारा जीवन यूँ ही हर शख्स है गवाँ रहा ।

Friday, November 06, 2009

" उन्होने चुपके से ज़हर पिला दिया "

गरज़ पड़ी न थी कि फिर से बुला लिया,
इस्तेमाल किया और भुला दिया ।

दवा-दारू से काम चला नहीं जब,
उन्होने चुपके से ज़हर पिला दिया ।

वक्त आया था जिंदगी जीने का जब,
खुदा ने चैन की नींद सुला दिया ।

हमारी हस्ती ही क्या है खुल के हँस लें ,
उन्होने इतना हँसाया कि रुला दिया ।

उन पर कुर्बानी से ये उम्मीद न थी,
प्यार का उसने ये क्या सिला दिया ।

Friday, October 30, 2009

“लेफ्ट-राइट” (बाल-गीत)

लेफ्ट-राइट, लेफ्ट-राइट, लेफ्ट-राइट,
करना न तुम किसी से छोटी भी फाइट,
लेफ्ट-राइट …

दोस्त बनाना मुश्किल होता , दुश्मन बनने हों आसान,
जो पाया है, क्यों है खोता , बात तू बच्चे मेरी मान,
लेफ्ट-राइट …

काम सभी करना तुम अच्छे, अच्छों की सोहबत में रहना,
करोगे जितनी मेहनत बच्चो, उतना ही सीखोगे सहना,
लेफ्ट-राइट …

न मुसीबत से घबराना, और न तुम बिन बात के रोना,
बनो बहादुर सबसे बच्चो, अपना संयम कभी न खोना,
लेफ्ट-राइट …

करना मान बड़ों का बच्चो, सेवा उनकी दिल से करना,
तभी तो पाओगे तुम अपने छोटों से भी मान का गहना,
लेफ्ट-राइट…

Saturday, October 10, 2009

"साफगोई इतनी तो ठीक नहीं"

साफगोई इतनी तो ठीक नहीं,
बदगोई करनी तो ठीक नहीं ।

दर्द तुमने दिया, जमाने ने दिया,
डर के मरना तो ठीक नहीं ।

इंसा हैं, गलित्याँ तो होंगी ही,
नज़र का झुकना तो ठीक नहीं ।

जिन गलियों ने किया बेआबरू,
उनसे गुजरना तो ठीक नहीं ।

दिल में दुश्मनी समेटे हैं अगर,
दोस्तों सा मिलना तो ठीक नहीं ।

Monday, October 05, 2009

"साफगोई इतनी तो ठीक नहीं"

साफगोई इतनी तो ठीक नहीं,
बदगोई करनी तो ठीक नहीं ।

दर्द तुमने दिया, जमाने ने दिया,
डर के मरना तो ठीक नहीं ।

इंसा हैं, गलित्याँ तो होंगी ही,
नज़र का झुकना तो ठीक नहीं ।

जिन गलियों ने किया बेआबरू,
उनसे गुजरना तो ठीक नहीं ।

दिल में दुश्मनी समेटे हैं अगर,
दोस्तों सा मिलना तो ठीक नहीं ।

Thursday, October 01, 2009

एक नन्ही-मुन्नी के प्रश्न*

मैं जब पैदा हूई थी मम्मी,
तब क्या लड्डू बाँटे थे?
मेरे पापा खुश हो कर,
क्या झूम-झूम कर नाचे थे?
दादी-नानी ने क्या मुझको,
प्यार से गोद खिलाया था,
भैया के बदले क्या तुमने,
मुझको साथ सुलाया था?
प्यार अग़र था मुझसे माँ,
तो क्यों न मुझे पढ़ाया था?
मनता बर्थ-डे भैय्या का है,
मेरा क्यों न मनाया था?
था करना मुझसे भेदभाव,
तो दुनिया में क्यों बुलाया था?
क्या मैं तुम पर भार हूँ माँ?
फिर तुमने क्यों ये जताया था?
तुम भी तो एक नारी हो,
क्या तुमने भी यही पाया था?
ग़र तुमने भी यही पाया था?
तो क्यों न प्रश्न उठाया था?
अपने वजूद की खातिर माँ,
क्यों मेरा वजूद झुठलाया था?
तुमने अपने दिल का दर्द,
कहो किसकी खातिर छुपाया था?
मैं तो आज की बच्ची हूँ,
मुझको ये सब न सुहाता है,
इस दुनिया का ऊँच-नीच,
सब मुझे समझ में आता है,
इसीलिये तो अब मुझको,
आँधी में चलना भाता है,
मेरी तुम चिंता मत करना,
मुझे खुद ही संभलना आता है।

* हिन्द-युग्म द्वारा पुरस्कृत एवँ प्रकाशित

Wednesday, September 30, 2009

"दोहे"

नश्वर जग में हैं सभी, मिटता सब संसार,
वर्तमान खोना नहीं, बीता दियो बिसार ।

प्रभु ने जितना है दिया, उससे कर संतोष,
प्रभु के न्याय में कभी, पायेगा ना दोष ।

बेशक ही मुँह फेर लें, दुःख में सारे लोग,
आप को तू स्वार्थ का, लगने दियो न रोग ।

रिश्तों की खातिर मरे, ऐसा जग में कौन,
अपने पर आने लगे, हो सब कुछ ही गौण ।

जीवन उसने ही दिया, है शेष सभी प्रपंच,
उसने थामी डोर है, ज़माना है रंगमंच ।

Friday, September 04, 2009

"अंतर"

तुम्हारी
और
मेरी सोच में
केवल
इतना अंतर है
तुम
जीवन टुकड़ों में
जीते हो
मैं
समग्रता में
तुम
संबंध
मतलब के
रखते हो
मैं
अंतरंगता के
निःस्वार्थ
तुम
केवल
अभी की
सोचते हो
मैं दूर की
यदि ये सब
भागम-भाग
तोड़-फोड़
धोखा-धड़ी
तुम
केवल
अर्थ के लिये
करते हो तो
अर्थ तो
वेश्या के पास भी
होता है
पर क्या
उसके पास
कोई समाज है?
रिश्ता है?
अपना है?
तुम तो
उससे भी
बदतर स्थिति में
प्रतीत होते हो
जो निज-स्वार्थ की खातिर
कुछ भी कर गुजरने को
तत्पर रहते हो
वेश्या की तो
अपनी मजबूरी है
तुम्हारी
क्या मजबूरी है?
केवल हवस की
या स्वार्थ
या फिर
तुम्हारी यही
फितरत है
कभी
स्वयँ से
पूछ कर देखो
तो तुम्हें
मन के आईने में
अपना प्रतिबिम्ब दिखाई देगा
और अपनी नग्नता देख
तुम स्वयँ से ही
घृणा करने लगोगे
फिर दूसरे तो
तुम्हारे क्या होंगे
तुम स्वयँ भी
अपने नहीं रहोगे

Sunday, August 16, 2009

"पप्पा चंदा ला दो"
(बाल कविता)
पप्पा-पप्पा चंदा ला दो,
मुझको उसके संग खिला दो,
तारों संग वो रोज खेलता,
टुकर-टुकर मैं इधर देखता,
उसको पता मेरा बता दो,
मुझको उसके संग खिला दो ।


पप्पा मुझको ये बतला दो,
चंदा रात में ही क्यों आता,
दिन में क्यों है वो छुप जाता,
क्या सूरज की गर्मी से डर,
या फिर वो घर में सो जाता,
मुझको उसका घर दिखला दो,
मुझको उसके संग खिला दो ।



चंदा को मामा सब कहते,
फिर क्यों इतनी दूर वो रहते,
क्यों बच्चों की नहीं हैं सुनते,
चौड़ा सा मैदान है उनका,
फिर भी हम से नहीं खेलते,
मेरे लिये चंदा को मना लो,
मुझको उसके संग खिला दो ।

बाल-उद्यान पर प्रकाशित(http://baaludyan.hindyugm.com/2009/07/pappa-chanda-la-do-kids-poem_30.html)

Tuesday, July 14, 2009

गतांक से

"मौत पर कुछ कविताएँ"

(4)

"छलता यथार्थ"

ऐ मौत
तू कहीं
छलावा तो नहीं
जो
जीवन के
हर पल को
अपनी धुंध से घेरे
डराती रहती है
तुझे तो
मैंने
एक यथार्थ की
संज्ञा दी थी
परन्तु
यह कैसा यथार्थ है
जो परत-दर-परत
जीवन के
अनसुलझे
रहस्यों में छिपा है
जिसे
न मैं देख पाता हूँ
न भोग पाता हूँ
और
न ही
महसूस कर पाता हूँ
न जाने
कैसा लगेगा
तुझसे मिल कर
समझ नहीं पाता हूँ
परन्तु
फिर भी
तेरा छलता सा यथार्थ
कभी न भूल पाता हूँ !
कभी न भूल पाता हूँ !!

Friday, July 10, 2009

गतांक से

"मौत पर कुछ कविताएँ"

(3)
तेरा स्वरूप

ऐ मौत
न जाने
तेरा स्वरूप
कितना सुंदर होगा
जिसने भी
तुझे देखा
तुझसे
विमुख नहीं हो पाया
बस तुझमें ही
समा गया
और तेरे
अनजाने स्वरूप
के सुंदर सपनों में
खो गया
एक चिरनिंद्रा
सो गया !

Wednesday, July 08, 2009

"बेशर्मी का जमाना है"

आजकल बेशर्मी का जमाना है,
गाली दे कर ताली बजाना है ।

वो किस हद तक गिर सकते हैं,
हमें भी ये बात आजमाना है ।

किसी की मेहरबानी दरकार नहीं,
इनायत-ए-खुदा का ख़जाना है ।

जाने-अनजाने रिश्ता है उनसे,
उसी का तो भरना जुर्माना है ।

पूजा-पाठ, गुरु बेकार हैं सब,
सही तो ज़मीर को जगाना है ।

Monday, July 06, 2009

गतांक से

"मौत पर कुछ कविताएँ"

(2)
"तेरा इंतजार"


तुझसे
मेरा
साक्षात्कार तो
नहीं हुआ मृत्यु
फिर भी
अपने चहुँ और
करता ही रहता हूँ
एहसास तेरा
पर मैं
तेरा स्वरूप
देखने की उत्सुकता से
बार-बार
विमुख हो जाता हूँ
एक निशिचत
मिलन को
टालने की
इच्छा लिये
करने लगता हूँ
फिर से
तेरा ही इंतजार !

Friday, July 03, 2009

"मौत पर कुछ कविताएँ"



(1)

"तेरे साथ अवश्य आऊँगा"
ऐ मौत
तेरा सामना करने से
डरता नहीं हूँ मैं
डर कर
होगा भी क्या
जब तू
आ ही जायेगी
तो
स्वयँ ही
दोस्ताना हो जायेगा
तू क्या मुझे ले जायेगी
मैं स्वत: ही
तेरे आगोश में
समाँ जाऊँगा
डरता तो मैं
जीवन से हूँ
जो हर मोड़ पर
तेरा एहसास कराता है
और पल-पल
याद दिलाता है
तेरा वजूद
तेरे अघोषित आगमन का
इसलिये
ऐ मौत
तू तो
मेरी शक्ति है
जो पग-पग पर
जीवन से जूझने को
प्रेरित करती है
अत:
तू तो
मेरी मित्र हुई
और
मैं अंत तक
यह मित्रता
निभाऊँगा
चाहे तू चाहे
चाहे न चाहे
तेरे साथ
अवश्य जाऊँगा !




........contd.

Thursday, July 02, 2009

"किसी को फुर्सत कहाँ है सोचने की !"

किसी को फुर्सत कहाँ है सोचने की,
अपने ज़मीर को कचोटने की !

हम भी शामिल हो गये नोचने में,
ज़रूरत क्या हमें है रोकने की !

बुराईयों से मुँह चुराना ठीक नहीं,
अच्छी आदत नहीं है टोकने की !

आने दे लक्ष्मी जिस राह भी आये,
पुरानी बातें हो गईं उसे मोड़ने की !

रिश्ते यूँ भी तो मतलब के ही हैं,
नौबत आती कहाँ है तोड़ने की !

Monday, June 29, 2009

"मेहमान उनको हमने बना लिया !"

दोस्ताना क्या हमने दिखा दिया,
दुश्मन अपना उन्हें बना लिया !

तरस क्या खायें उस पर हम,
खुद को तमाशा जिसने बना लिया !

आईना तो झूठ कहता नहीं,
अक्स ही झूठा उसने बना लिया !

दर्द को और काँटे चुभाना नहीं,
दिल में घर उसने अपना बना लिया !

शाम को फिर मुलाकात हो न हो,
मेहमान उनको हमने बना लिया !

Friday, June 26, 2009

"मेरे नाना"(बच्चों के लिये कविता)

मेरे नाना, मेरे नाना,
जब मैं तुम से कहता हूँ कि,
अच्छी सी तुम टाफी लाना,
कहते हो क्यों ना, ना, ना, ना !
रोज सुबह जब उठता हूँ तो,

दाँत माँजने को हो बुलाते,
प्यार से फिर तुम गोद में ले कर,
मुझको हो तुम दूध पिलाते,
ना-नुकर जब करता हूँ,
लाली-पाप हो मुझे दिखाते,
वैसे ग़र मैं माँगू टाफी,
करते हो तुम ना, ना, ना, ना ,
ऐसा क्यों करते हो नाना !
सुनो ऐ मेरे प्यारे बच्चे,

तुम हो अभी अक्ल के कच्चे,
ढेर-ढेर सी टाफी खा कर,
दाँत तुम्हारे होंगें कच्चे,
ग़र टाफी ज्यादा खाओगे,
मोती-से दाँत सड़ाओगे,
चबा-चबा कर फिर ये बोलो,
खाना कैसे खाओगे?
तभी तो कहता मैं हूँ तुमको,
कम से कम टाफी तुम खाना,
नुक्सान नहीं दाँतों को पहुँचाना,
नाना की तुम बात को मानो,
टाफी तुम ज्यादा न खाना,
टाफी तुम्हे तभी मिलेगी,
बोलो जब तुम हाँ, हाँ, नाना ।

Thursday, June 25, 2009


“बनाएँ क्यों उन्हे सनम !”


यूँ ही तो चुप नहीं हैं हम,
कोई तो होगा हमको ग़म !

जमाने की हवा ऐसी,
नहीं करता कोई शरम !

तू वक्त की ज़ुबाँ समझ,
कभी न रोक तू कदम !

नमक ज़ख्मों पे जो छिड़कें,
दिखाएँ क्यों उन्हे ज़ख्म !

जो दिल की बात न जाने,
बनाएँ क्यों उन्हे सनम !

Tuesday, June 23, 2009

"मेरी कविता का दर्द!"

मन ने
कुछ शब्द
बुदबुदाये
कविता बन गये
भावों की
सरिता बन गये
शब्दों में
मन की व्यथा
उकेर कर
कहीं से कुछ
कहीं से कुछ
ले लेता हूँ
और सभी कुछ
शब्दों को
दे देता हूँ
मैं ही क्यों झेलुँ
सारी व्यथा
शब्दों के द्वारा
कुछ तुम्हें भी
दे देता हूँ
भार उठाते-उठाते
कमजोर पड़ चुके
अपने काँधों का
कुछ भार
तुम्हें भी दे देता हूँ
तुम भी तो
कुछ भार सहो
मेरे शब्दों की
मार सहो
फिर अगर
कह सको तो कहो
मैंने क्या पाया
क्या खोया है
तुमने क्या पाया
क्या खोया है
मेरी कविता ने
जो दर्द बोया है
उसे कम से कम
तुम्हारी आँखों ने
नमी में तो
पिरोया है !

Friday, June 19, 2009

"मेरे नाना"(बच्चों के लिये कविता)

मेरे नाना, मेरे नाना,
जब मैं तुम से कहता हूँ कि,
अच्छी सी तुम टाफी लाना,
कहते हो क्यों ना, ना, ना, ना !

रोज सुबह जब उठता हूँ तो,
दाँत माँजने को हो बुलाते,
प्यार से फिर तुम गोद में ले कर,
मुझको हो तुम दूध पिलाते,
ना-नुकर जब करता हूँ,
लाली-पाप हो मुझे दिखाते,
वैसे ग़र मैं माँगू टाफी,
करते हो तुम ना, ना, ना, ना ,
ऐसा क्यों करते हो नाना !

सुनो ऐ मेरे प्यारे बच्चे,
तुम हो अभी अक्ल के कच्चे,
ढेर-ढेर सी टाफी खा कर,
दाँत तुम्हारे होंगें कच्चे,
ग़र टाफी ज्यादा खाओगे,
मोती-से दाँत सड़ाओगे,
चबा-चबा कर फिर ये बोलो,
खाना कैसे खाओगे?
तभी तो कहता मैं हूँ तुमको,
कम से कम टाफी तुम खाना,
नुक्सान नहीं दाँतों को पहुँचाना,
नाना की तुम बात को मानो,
टाफी तुम ज्यादा न खाना,
टाफी तुम्हे तभी मिलेगी,
बोलो जब तुम हाँ, हाँ, नाना ।

"बात कहने से कौन डरता है !"

बात कहने से कौन डरता है,
सच को लेकिन कहाँ वो सुनता है !

हम वो शायर नहीं हैं दुनिया में,
देख चेहरा जो बात कहता है !

अब तो दस्तूर है जमाने का,
सिर्फ मतलब से दोस्त बनता है !

कौन चाहे उसे जमाने में,

जो आईना हाथ में रखता है !

रिश्ते-नाते हैं सारे बेमानी,
मन से मन जब न मिलता है !

Sunday, June 14, 2009

“आज के दोहे”

आज भावना देश में, बिके कोड़ियों मोल,
द्वेष मिले हर वेश में, चाहे जितना तोल !

मर जायेगा खोज के, अपना नाही कोय,
पेट भरन को आपना, नोचेंगें सब तोय !

सुन ले प्यासे की कुआँ, ऐसी नाही रीत,
पानी का भी मोल है, सीख सके तो सीख !

चौराहे पर मैं खड़ा , सोचुँ कित को जाऊँ,
पकड़ूँ जिसका हाथ भी, असत ही मैं पाऊँ !

जीने की क्या बात है, चाहे जिस तरह जी,
विष पर भ्रष्टाचार का, अमृत मान और पी !

Tuesday, June 09, 2009

"दोहे"
अपनी-अपनी सोच है, अपने-अपने मूल्य,
पाप-पुण्य कुछ भी नहीं, अंत में सब कुछ शून्य !
अपना-अपना भाग है, अपने-अपने करम,
धर्म के ठेकेदार भी, करते देखे अधर्म !
करके पूजा-पाठ ही, जीवन दें बिताये,
ईश्वर की इसी सृष्टि को, दे मान नहीं पाये !
अपने-अपने स्वार्थ को, जीते सारे लोग,
छुरा पीठ में घोंपना, सबके मन का रोग !
जीना है तो सीख ले, तू भी करना घात,
वरना तू हर मोड़ पर, पायेगा बस मात !

Friday, June 05, 2009

"दर्पण के टुकड़े"

टूट चुके
दर्पण के टुकड़ों को
सहेज कर
जोड़ने में
एक उम्र बीत जाती है
फिर भी दर्पण पहले जैसा
नहीं बन पाता
जाने क्यों
कोई समझ नहीं पाता
फिर भी
दर्पण के टुकड़े
करने में
लगे रहते हैं लोग -
दर्पण भावनाओं का
दर्पण विश्वास का
दर्पण रिश्तों का -
ये जीवन भी तो
दर्पण ही है
जिसके टुकड़ों पर
चलने से
लहूलुहान हो जाते हैं लोग
पर कोई
फिर से
जोड़ नहीं पाता
उन टुकड़ों को
फिर भी जाने क्यों
टुकड़े करने में
लगे रहते हैं लोग !
व्यस्त रहते हैं लोग !!

Monday, May 25, 2009

"हसरत"

हसरतों का जीवन
जीता रहा हूँ मैं
अपना हर पल
हर क्षण
मृगतृष्णा को
अर्पित करता रहा हूँ मैं
जब तक
ये समझ में आया मुझे
हसरतों का
कोई अर्थ ही न रहा
मेरी हर उपलब्धि
हर प्रयास
व्यर्थ ही गया
और मैं
इसी सोच में
पड़ गया
कि इस जीवन में
मैंने क्या पाया
और
जीवन ने
मुझसे क्या पाया
अपनी हसरतों की
लम्बी फेहरिस्त लिये
मैं भटकता ही रहा
पग-पग पर
बार-बार
अटकता ही रहा
अब जब
मैं इन हसरतों के
माया जंजाल से
उबर चुका हूँ
तो
स्वयं को
कुछ भी कर पाने में
असमर्थ पाता हूँ
जो भी
करना था
या करना चाहिये था
उसके
स्वप्न ही ले पाता हूँ

पर अब
अपनी हसरत
पूरी कहाँ कर पाता हूँ

Friday, May 22, 2009

"उपेक्षा"

दो शब्दों की
बात तो थी
वो भी
न कही गई तुमसे
तुम्हारी
यही उपेक्षा
न सही गई मुझसे
फिर भी
जाने क्यों
मैं अपने-तुम्हारे बीच
एक मौन तरंग सी
लहराती हुई पाता हूँ
और कहीं पर
तुम्हे
अपने करीब पाता हूँ
ये मौन ही तो है
जिसने
हमको बाँध कर
रखा है अब तक -
मौन भावनाएँ,
मौन नयन,
मौन शब्द -
इशारों-इशारों में
बहुत कुछ कह जाते हैं
शायद कहीं
मेरे-तुम्हारे अंदर
अभी भी
कुछ बचा है
जो आपस में
जुड़ा है
इसलिये तुम
कुछ न कहो
तो
मुझे दुःख होता है
पर मेरा मन
तुम्हारी उपेक्षा पा
चुपचाप रोता है
कि
शायद मेरा मौन
तुम्हे भी
कभी समझ आ जाये
और हम
और करीब आ जायें
और ये
मौन की दीवार टूट जाये




Thursday, May 14, 2009

"मेरे बिन तुम कहाँ हो"

मैं हूँ
तो तुम हो
मुझसे ही तो
सारा जहाँ है
मैं न रहूँ
तो मेरे लिये
तुम्हारा
या
किसी और का भी
वजूद ही कहाँ है
इ्सीलिये तो कहता हूँ
मेरे बिना
न रहें खुशियाँ
न रहें ग़म
न रहो तुम
न रहें हम
पर मेरे बाद
तुम्हारे लिये तो
मेरा असतित्व रहेगा ही-
बेशक ख्यालों में ही-
मुझे मेरी
अच्छाईयों-बुराईयों के कारण
याद तो करोगे ही
और शायद सोचोगे
कि काश मैं होता
जिससे तुम
मन की बात कह पाते
पर तब
मैं नहीं होऊँगा
तुम्हारे असतित्व की
सम्पूर्णता के लिये
इसलिये
स्वीकार कर लो
कि मैं हूँ तो
तुम हो
मेरे बिन
तुम्हारा या किसी और का
वजूद ही कहाँ है !
वजूद ही कहाँ है !!

Monday, May 04, 2009

"हमेशा के लिये !"

कौन
सूली पर
लटकना चाहता है
सच की खातिर
झूठ बोल कर
अपनी जगह
दूसरे को
लटका देना चाहता है
सूली पर
हर कोई
आजकल तो
सभी का है
यही व्यवहार
संज्ञा दे दी जाती है
सच बोलने वाले को
मूर्ख की
और
बाकियों को
कहा जाता है
दुनियादार
दुनिया में
बस चलता है
यही व्यापार
इसीलिये तो
सच बैठ जाता है
एक अंधेरे कोने में
मुँह छुपा कर
जाने कब
चढ़ना पड़ जाये
सलीब पर
झूठ की खातिर
और
चुरा ले ये संसार
सच से मुँह
हमेशा के लिये !
हमेशा के लिये !!

Thursday, April 30, 2009

"गज़ल"

मुश्किल जीना अब होता जा रहा है,
सांस भी घुट-घुट के हमको आ रहा है ।

जानवर को मिल जाता है ऐशो-आराम,
इंसा कूड़े से भी चुन कर खा रहा है ।

बस गईं चारों तरफ घनी बस्तियाँ,
तन्हा खुद को हर शख्स पा रहा है ।

साफ गोई तो उसे मंजूर न थी,
पाठ मुझको झूठ का सिखला रहा है ।

एहसानात चंद क्या उसने कर दिये,
बेवजह वो जुल्म मुझपर ढा रहा है ।

उदासी पहले ही कुछ कम न थी,
गीत दर्द के कोई क्यों गा रहा है ।

Tuesday, April 28, 2009

"कुछ तो कहो"

कमियाँ मेरी

जगजाहिर करते हो

और

खूबियों से मेरी

मुँह चुराते हो

अपने व्यव्हार से

तुम क्या जतलाते हो ?

क्या मेरी खूबियाँ

या फिर मैं

तुम्हारे लिये

कोई एहमियत नहीं रखते

या फिर

मेरी खूबियों का

जिक्र करते हुए

डर लगता है तुम्हें

कि

तुम नेपथ्य में

न चले जाओ

और मुझे

महत्ता मिल जाये

या फिर

तुम्हारे अंदर का अहँ

सहन नहीं कर पाता

कि

कोई तुमसे आगे बढ़े

और तुम्हें

उसके पदचिन्हों पर

चलना पड़े

कोई बात तो है

जो तुम

खुले व्यवहार से

कतराते हो

और इसीलिये

मन के दरवाजे

बंद रखते हो

कुछ तो कहो

यूँ ही चुप न रहो

कम से कम

तुम्हें समझ पाऊँ मैं

यूँ ही

मन का बोझ

न व्यर्थ बढ़ाऊँ मैं

कुछ तो कहो

चुप न रहो


Friday, April 24, 2009

"गज़ल"

मँझधार की आदत हो ही गई,
किनारों से अदावत हो ही गई ।

जब से दोस्त हुए दुश्मन,
दुश्मन संग दावत हो ही गई ।

थी लाख करी कोशिश हमने,
पर ग़म से चाहत हो ही गई ।

जब मिला दोगला सारा जहाँ,
दुनिया से बगावत हो ही गई ।

निकले तो थे गुल की खातिर,
ख़ारों से कुर्बत* हो ही गई ।

मुँह बेशक फेर के चल दें वो,
अँखियों से कयामत हो ही गई ।

न याद करूँ, न भूलूँ उन्हे,
यूँ दिल की हालत हो ही गई ।

शामो-सहर घर सूना मिले,
अब ऐसी किस्मत हो ही गई ।

राहें दिल की पथरीली हुईं,
ऐसी कुदरत ये हो ही गई ।

* नजदीकी

Thursday, April 23, 2009

"ऐसा राम चाहिये"

सुना था
जो बोओगे
वो ही तो काटोगे
पर मैंने तो
गमले में
गुलाब था लगाया
यह कैक्टस कैसे उग आया !
मैं समझ नहीं पाया !!
हर कहावत को
चरितार्थ करने के लिये
उसका सही अर्थ
समझने वाला भी तो चाहिये
अर्थ को सही परिभाषा
देने वाला भी तो चाहिये
आजकल तो चहुँ और
अर्थों को
अपने पक्ष में
तोड़ने-मरोड़ने वालों का ही
बोलबाला है
निज स्वार्थ
और
शाश्वत सच्चाई को
हर शख्स ने
बड़ी बेशर्मी से
बेमौत मार डाला है
आजकल तो
सच को झूठ
और झूठ को सच
में बदलने वालों की
एक कतार सी लगी है
एक को गोली मारोगे
तो उसका स्थान
लेने वालों की
भरमार सी लगी है
आज तो
कोई ऐसा राम चाहिये
जो एक ही बाण से
झूठ/फरेब/धोखे जैसे
कई जहरीले पेड़ों के
रावण को
एक ही बाण से
बींध डाले

Wednesday, April 22, 2009

"विफलता"

गल्तियों का
पुतला मान कर
अपना लेते मुझे
तो शायद
कोई खूबी
मिल ही जाती
तुम्हें अनजाने में
मुझमें
यूँ तो
कोई भी सम्पूर्ण नहीं होता
(शायद तुम भी नहीं)
पर
हरेक व्यक्ति
दूसरों की
कमियाँ ढूंढने
और उन्हें
उजागर करने में ही
व्यस्त है आजकल
शायद ये सोच कर
कि
इससे वो अपनी कमियाँ
दूसरों की
दृष्टि से छुपा पायेगा
पर क्या
स्वयं को
स्वयं से ही
छुपा पाने में
सफल हो पायेगा
अच्छा होता
अगर दूसरों में
कमियाँ ढूंढने के बजाय
हर कोई
अपनी कमियाँ
दूर कर पाता
तो कभी
जीवन में
विफल न होता
कभी न होता

Monday, April 20, 2009

"सिलसिला"

कराहती हुई जिंदगी
खौलते हुए पानी सी
ज्वलंत इच्छाओं के
सागर में
बार-बार डुबकी लगाती है
और
एक और घाव ले
किनारे आ जाती है
इस गहमागहमी की
तपती रेत में
थोड़ा विश्राम कर
फिर से
आतुर हो जाती है
उसी खौलते पानी में
डूब जाने को
जाने कब तक
चलता रहता है
यही सिलसिला
अनजाने में
मन:स्थिति
समझ नहीं पाती है
कुछ और पाने की
कर पाने की
प्यासी लालसा
बार-बार ही तो
नया घाव बना जाती है
और अंत में
जब शांत हो जाती हैं
सभी इच्छाएँ
सभी लालसाएँ
और प्रचंड अग्नि
लील जाती है
सारी भौतिकताएँ
तो सारी लालसाएँ
सारी इच्छाएँ
लोप हो जाती हैं
गुमनाम अंधेरे में
कौन मान रखता है
इन इच्छाओं का
इन उपलब्धियों का
कोई भी
कुछ भी तो नहीं
जान पायेगा
पर फिर भी
मन स्वयँ को
रोक नहीं पाता है
एक बार फिर से
उन्ही अन्जान गहराईयों में
उतर जाने को
और यही सिलसिला
चलता रहता है
चलता रहेगा
मेरे साथ
तुम्हारे साथ
सभी के साथ

Friday, April 17, 2009

"नेमते-खुदा"

गर्द उड़ती रही, उड़ के जमती रही,
दास्ताँ जिंदगी की, यूँ ही तो चलती रही ।

राह मिलती रही, मिल के मिटती रही,
फ़ेहरिस्त मंज़िलों की, रोज़ ही बनती रही ।

स्वप्न बुनते रहे, रोज हम तो नये,
ठोकरों से लोहे सी, दीवार भी ठहती रही।

डूबता सूरज हमें, निराश कर सकता नहीं,
रात इरादों की नये, फ़साने जो कहती रही ।

आँधियों का शोर, परेशान तो करता रहा,
लौ नई उम्मीद की, पर मेरी जलती रही ।

छाले पाँवों में पड़े, राह के अंगार से,
आग दिल की मेरी, और भी तपती रही ।

हर कदम उठे नया, जोश के हुंकार से,
नेमते-खुदा मदद, आप ही करती रही ।

सोच में न डूब तू, हार कर न बैठ तू,
हर नई उमंग यूँ, बेमौत ही मरती रही ।

Wednesday, April 08, 2009

जीवन का राज !

मेरे चेहरे की
गहरा चुकी झुर्रियों में
जीवन का राज छुपा है
इनमें
खाई हुई ठोकरों का
अन्जाम और आगाज छुपा है
ये तो है
तुम पर मुनहस्सर
कितना समझ पाते हो
इनका स्वर
तुम चाहो अगर
समझना इनका स्वर
तो थोड़ा तो
झुकना ही पड़ेगा
मुझे अहमियत देने का
कष्ट तो झेलना ही पड़ेगा
वरना
इन बुढ़ा गई हड्डियों में
इतना दम तो है अभी
कि तुम्हारी जवानी का
तुम्हारी नादानी का
बोझा उठा सके
पर तुम
मरहूम ही रह जाओगे
मेरी झुर्रियों में छुपे राज से
मैं तो सो जाऊँगा
चैन की नींद
पहुँच कर
जीवन के अन्जाम तक
लेकिन तुम
जूझते ही रह जाओगे
जीवन की अनसुलझी पहेली से
जीवन की कड़वी सच्चाईयों के
अन्जाम से
और फिर
मन ही मन
कोसोगे मुझको
(या शायद स्वयँ को भी)
और कहोगे यही बात
कल की जवानी से
और चलता रहेगा
यही सिलसिला
पीढ़ी दर पीढ़ी !
पीढ़ी दर पीढ़ी !!

Wednesday, April 01, 2009

क्यों होता है ?

मैं जानता हूँ
मेरे इस दुनिया से
जाने के बाद
मेरी बुराइयों को
मेरी कमियों को
भूल कर
मेरी अच्छाइयों को ही
याद करोगे
तो फिर
मेरे रहते हुए
क्यों नहीं कर पाते हो
इन्हे तुम दरनिकार
क्यों नहीं कह पाते
मेरी अच्छाइयों को
मेरे मुँह पर ही
क्यों नहीं कर पाते
इनके कारण तुम
मुझसे प्यार
बस मेरी कमियों को
सामने रख कर
बना लेते हो
नफरत की एक
झीनी सी दीवार
क्या बता सकते हो ?
क्यों होता है ये बार-बार ??
क्यों छुप जाते हैं
किसी के गुण
अवगुणों के भीतर
क्यों अवगुणों से
हरदम जाते हैं हार
और उभर पाते हैं
किसी को खो कर ही
क्यों होता है ये बार-बार ?
क्यों होता है ये बार-बार ??

Thursday, March 19, 2009

"क्यों काँटे है चुभाता !"

मेरा प्यार ग़र तुझपे कोई असर दिखाता,
कभी तो तेरी आँख को नम कर जाता !

दम भर के दोस्ती का, दुश्मनी निभाते रहे,
दोस्त तो दुश्मनी में भी दोस्ती है निभाता !

सुबह की रौशनी हमें कभी न मिली, न सही,
शाम को तो मज़ार पर कोई दीया जलाता !

जीवन के रेगिस्तान में, आँख में कण पड़ेंगे ही,
कोई तो होता जो मेरी आँख सहला जाता !

बाद मरने के ग़र मैय्यत पर फूल चढ़ाने हैं,
तो फिर जीते जी क्यों काँटे है चुभाता !

Thursday, February 12, 2009

मैं दर्द पिया करता हूँ !

मैं दर्द पिया करता हूँ, मर-मर के जिया करता हूँ,
फिर भी इस दुनिया को, लहू अपना दिया करता हूँ !

सब संगी-साथी छूटे, अपने थे जो वो रूठे,
मन में जो बातें आयें, मैं खुद से किया करता हूँ !

कोई वक्त न ऐसा आये, तुझको न याद दिलाये,
अब तो मैं खुदा के बदले, तेरा नाम लिया करता हूँ !

रुसवा तुझको नहीं करना, चाहे पड़ जाये मुझे मरना,
कोई जान न पाये दिल की, ले होंठ सिया करता हूँ !

मौसम है बदला-बदला, बदली-बदली हैं निगाहें,
पा लूँ मैं निशाँ जहाँ तेरा, वो राह लिया करता हूँ !

Tuesday, February 10, 2009

बेचारा हूँ !

ये माना कि
मैं
स्वयँ से ही
बार-बार हारा हूँ
अपनी ही दृष्टि में
बना कई बार
बेचारा हूँ
तुमने भी तो
कई बार
मुझे ठोकर खा कर
गिरते हुए
देखा होगा
कितना मूर्ख है
ये भी सोचा होगा
पर
तुमने क्या
हाथ बढ़ा कर
मुझे उठाना चाहा
बस
मेरी हँसी ही
उड़ाना चाहा
क्या कभी तुम्हे
ठोकर न लगेगी
प्रकृति तुम्हारे संग
कभी खेल न करेगी
पर मैं फिर भी
ऐसा न कर पाऊँगा
तुम्हे
तुम्हारे हाल पर
न छोड़ पाऊँगा
इसीलिये तो मैं
स्वयँ से
बार-बार हारा हूँ
अपनी दृष्टि में
बना कई बार
बेचारा हूँ !
बना कई बार
बेचारा हूँ !!

Saturday, February 07, 2009

पीड़ा से लिया जोड़ है नाता !

पीड़ा से लिया जोड़ है नाता,
नहीं बुझती है जी की ज्वाला !

बोझ लगे हैं सारे बंधन,
कौन सुने है मन का क्रंदन,
व्यर्थ किया खुशियों का चंदन,
जीवन में ये क्या कर डाला !

पलकों में अवसाद भरा है,
होठों पर नहीं बात जरा है,
भावशून्य लग रही धरा है,
कैसे तम को करूँ उजाला !

कोई भी नहीं मीत यहाँ है,
ढूँढे पर भी प्रीत कहाँ है,
धोखे की बस रीत यहाँ है,
बनी घृणा सब का है निवाला !

Wednesday, February 04, 2009

गज़ल !

लगे इल्जाम सौ-सौ, कोई भी सुनवाई न हुई,
उन्हे तो कत्ल करके भी कभी रुसवाई न मिली !

हुए कुर्बान उनपे बिना ही शर्त के यारो,
उन्होने ज़ख्म सहलाने की ज़हमत भी नहीं करी !

ये माना बार-बार गल्तियाँ दोहराई हैं मैंने,
खुदा का बंदा हूँ, मुझमें खुदाई तो नहीं भरी !

नहीं डरना है वाजिब चोट से मिलता है दर्द ग़र,
हुए रौशन अँधेरे बिन दीया जलने के हैं कभी !

कोई जाने ये कैसे, कौन अपना है, पराया है,
कोई प्यारी सी शै खो दें, इल्म होता है तभी !

Friday, January 23, 2009

खुदा अपना भी तो है यारो !

खुदा तुम्हारा तो खुदा अपना भी तो है यारो,
खुदा के वास्ते, खुदा का नाम तो न बिगाड़ो!

मज़हबी जुनून जीने के लिये अच्छा नहीं है,
आपसी लड़ाई में खुदा को गर्द में न उतारो !

नहीं मालूम कहाँ से आये, कहाँ चले जायेंगें,
कम से कम जहाँ में कोई जिंदगी तो सवारो!

अपना घर बसे या उजड़े, खुदा की मर्जी है,
किसी का घर तुम बेवजह तो न उजाड़ो !

सोच अपनी-अपनी, कर्म भी अपने-अपने,
अपनी-अपनी जिंदगी को चैन से गुजारो !

Tuesday, January 20, 2009

एक आशावादी गीत !

मौत से तू जिंदगी न तोल,
दोनों के अलग-अलग है बोल !

जिंदगी सुबह का नाम है,
मौत रात की गुलाम है,
द्वार नव-प्रभात का तू खोल !

जिंदगी हसीन फूल है,
मौत रास्ते की धूल है,
फूल संग काँटों का है मोल !

जिंदगी खुशी का नाम है,
मौत सब पर विराम है,
बोल मीठे जिंदगी के तू बोल !

जिंदगी कहे तू आगे चल,
मौत है सभी का बीता कल,
आज को तू जी ले आँख खोल !

जिंदगी के रास्ते कठिन,
मौत रोक देती एक दिन,
नित नये रास्ते टटोल !

जिंदगी के रास्ते अनेक,
मौत का रास्ता तो एक,
खोना नहीं राह अनमोल !

जिंदगी लिखे है कविता,
मौत सिर्फ एक जड़ता,
लिखता जा तू रोज नये बोल !


Wednesday, January 07, 2009

सोचते रहने से फतह कहाँ होती है!

कभी तो बात की इन्तहा होती है,
बिन दीए, रौशनी कहाँ होती है !

चलते रहने से गुरेज़ न कर कभी,
वरना मंजिले तय कहाँ होती हैं !

कौन मिला है अपना कभी वीरानों में,
जुदाई वहीं, दोस्ती जहाँ होती है !

न अफसोस कर दिल के टूट जाने का,
गमीं वहीं, खुशियाँ जहाँ होती हैं !

दास्ताँ यूँ ही अधूरी न छोड़ अपनी,
सोचते रहने से फतह कहाँ होती है !

Saturday, December 20, 2008

कोई कैसे बच सकता है !

हर एक कदम जो उठता है,
वो तेरी और ही चलता है,
दूरी नहीं है पल भर की,
इंतजार में जीवन कटता है !

तू याद रहे हर कदम पे है,
न जाने कब निकले ये दम,
दुष्कर्म को लेकिन करते हुए,
नहीं याद तुझे कोई रखता है !

अपने कर्म बस अपने हैं,
नहीं दोष खुदा का कोई है,
क्यों दोष खुदा को देता है,
कर्मों का सिला जब मिलता है !

बस अपने छाले दिखते हैं,
किसी और दर्द की क्या परवाह,
होती तकलीफ तभी तो है,
अपना ज़ख्म जब रिसता है !

तेरे साये में रहता जीवन,
हर रंग में तू ही बसती है,
तू मिलती है सबको लेकिन,
नहीं रूप किसी को दिखता है !

यूं तो जीवन इक आशा है,
और मौत का नाम निराशा है,
पर साथ न दोनों का हो तो,
जीवन कैसे चल सकता है !

जीवन को धोखा देना तो,
सबसे आसाँ काम है पर,
मौत के सच से तू बोल,
कोई कैसे बच सकता है !

Tuesday, December 09, 2008

अपना अस्तित्व !

दो शब्द
मेरी तारीफ में ही
दिये होते
तो तुम्हारा
क्या चला जाता
आजकल तो
लोग दिखावे में ही
करते हैं विश्वास
दिखावे की जिंदगी
जीते हैं
और
दिखावे की ही
लेते हैं साँस
फिर कैसे
रहेंगे दिल पास-पास
सब अपने-आप में ही
सिमट गये हैं
दूसरों से तो हैं ही
स्वयँ से भी
विमुख हो गये हैं
हमारी सम्पूर्णता
स्वयं को ही पाने में
तो नहीं है
दूसरों को
साथ चलाने में भी है
तभी तो
हमें अपने अस्तित्व का
होगा भास
अपना 'मैं' तो
है अपने ही पास
ओरों का मैं भी तो
होगा फिर अपने पास !

Thursday, November 27, 2008

मैं अकेला ही भला था !

जब भी
तुम अकेले थे
मुझे
अपने पास ही तो पाया
फिर
भरी भीड़ में मुझे
कहो
क्यों कर भुलाया?
मैं आज तक
समझ नहीं पाया
समझ नहीं पाया कि
क्या ये
तुम्हारी ही
फितरत है
या फिर
दुनिया का
दस्तूर ही ऐसा है
चलो ये माना कि
दुनिया का
दस्तूर ही ऐसा है
तो तुम्ही कहो
जब भी मैं
अकेला पड़ूँ
तो
किसका हाथ पकड़ूँ
इससे अच्छा तो'
मैं
अकेला ही भला था
अकेला ही भला रहुँगा
कम से कम
स्वयँ को
स्वयँ के साथ तो
पा पाऊँगा
और
ठगे जाने के
एहसास से
मुक्त हो जाऊँगा!


Tuesday, November 25, 2008

"गीत" - सबका ही एक अंत है !

जीवन तो प्रपंच-मंच है,
एक खुदा औ’ मौत ही सच है !

अहं बना है सबकी रोटी,
नज़र हुई है सबकी खोटी,
भाग-दौड़ में सभी व्यस्त हैं,
मतलब औ' माया ही सत है,
कौन किसे दोषी ठहराये,
बना झूठ सबका कवच है !

कर्मों की तब याद है आती,
जब-जब हम शमशान हैं जाते,
बाहर निकलते ही पल भर में,
लेकिन हम सब भूल हैं जाते,
खाने को इक-दूजे को तत्पर,
सबका ही पर एक अंत है !

Sunday, November 16, 2008

रिश्तों में उल्हास !

हम जो हैं
सो हैं
तुम जो हो
सो हो
फिर रिश्तों में
क्यों खटास हो
कभी तो सोचो
ग़र
नहीं समझ पाते हो
तो अपनी कमी ही
दर्शाते हो
क्योंकि
स्वयँ को
समझ लेना ही तो
बुद्धिमानी नहीं
अपनी कमी को
छुपाना ही तो
चतुराई नहीं
रिश्तों में
बुद्धिमानी और चतुराई
न केवल
अपनी कमियाँ ढ़ाँपने में है
दूसरों की कमियों को भी
ढ़ाँपने एवँ
दरनिकार करने में है
तभी तो
इक-दूजे में विश्वास
बना पायेंगें
और रिश्तों में उल्हास
आ पायेगा
और
हम आ पायेंगें
और पास-पास

Wednesday, November 12, 2008

छोड़ो ये बदगुमानी !

तुमने तो जो ख़ता की,
सरेआम की,
हमने तो फिर भी लाज की,
तेरे नाम की !

तुम अपनी बात कह कर,
मेरी भी बात सुनते,
न मुझको रोना पड़ता,
न तुम भी ऐसे रोते,
नहीं होती जगहँसाई,
किसी बात की !

हर शख्स का है होता,
अपने ही दिल का तूफाँ,
कोई यूँ ही रोक लेता,
कोई बाँध तोड़ देता,
इस बात को समझ,
है बात काम की !

जीना तो सबको जीना,
और एक दिन है मरना,
फिर संग अपने बोलो,
क्यों अहँ लेके चलना,
चलो साथ-साथ मिलके,
छोड़ो ये बदगुमानी !

Monday, October 27, 2008

शीशे सा था वतन मेरा !

शीशे सा था वतन मेरा, किसने है चकनाचूर किया,
स्वार्थ में अंधा हो कर के, भाई भाई से दूर किया ।

निर्मल से दर्पण में था दिखता, चेहरों पर भारत का नूर,
हर टुकड़े में है अब बसता , बस अपनी ‘मैं’ का ही सुरूर,
देश पे मरने वालों ने ही, देश को है कमजोर किया ।


अपनों को अपने घर से ही अब बेघर करते फिरते हैं,
अपनों पे अंगुली उठाने को ही अच्छी बात समझते हैं,
कड़वी बात को कहने को तुमने ही तो मजबूर किया ।

एक से इंसा, एक से रिश्ते, भाषा अलग-अलग अपनी,
सीखो देना तो है मिलता, न हाँको बस अपनी-अपनी,
दिल को थोड़ा बड़ा करो, भगवान ने है भरपूर दिया ।

Monday, October 13, 2008

सारा शहर वीराँ हो गया !

तान के चादर सोये रहे वो,

सारा शहर वीराँ हो गया ।



रश्क हमसे करते रहे वो,

अपना तो सारा जहाँ हो गया ।



उन्हे फुरसत न थी हमारे लिये,

हाल उनपे कैसे बयाँ हो गया ।



रफ्ता-रफ्ता कटे मुश्किल रस्ते,

फिर से काँटों का समाँ हो गया ।



वो तो जैसे थे वैसे ही रहे,

मैं जाने क्या से क्या हो गया ।

Friday, September 26, 2008

प्रेम की परिभाषा तो न झुठलाओ!

तुम्हे
मुझसे प्रेम है
या
मेरे स्वभाव से
इतना तो
तय कर लिया होता
प्रेम की
परिभाषा तो
अपने आप में ही
सम्पूर्ण है
इसलिये प्रेम
टुकड़ों में नहीं होता
इतना तो
समझ लिया होता
इसीलिये तो
कहता हूँ
कि
पहले मन का
ये संशय तो
दूर कर लो
कि
तुम्हे
मुझसे प्रेम है
या
मेरी बुराईयों से
परहेज है
तुम्हे ग़र
मेरी बुराईयों से
गुरेज़ है
तो
ये तो बता दो
इन्हे मैं कहाँ छोडूँ
कैसे मैं
अपने अंतस से ही
नाता तोडूँ
यदि
मुझे अपनाना है
तो
सम्पूर्ण अपनाओ
पर
प्रेम की परिभाषा
तो न झुठलाओ
न खुद बहको
न मुझको बहकाओ

Thursday, August 28, 2008

एक नया वज़ूद रचें !

ग़र हम
किसी के नहीं
तो स्वयँ
अपने भी तो नहीं
किसी को
कुछ देने से
हम लेने का
अधिकार भी
स्वयँमेव ही
पा जाते हैं
इसीलिये तो
प्यार से
प्यार का बढ़ना
और
नफरत से
नफरत का बढ़ना
हो जाता है
अतएव
किसी का
न हो पाना
किसी को
प्यार न कर पाना
अपने वज़ूद को ही तो
नकारना है
तभी तो कहता हूँ
कि
ग़र मिटना ही है
तो क्यों न
किसी और के लिये मिटें
क्यों न
किसी और के बनें
और
अपने वज़ूद को
किसी और के
वज़ूद में
समाहित कर
एक नया
वज़ूद रचें !


Monday, August 25, 2008

मज़हब है हिन्दुस्तानी !

मज़हबी बात न कर नादान,
वतन की फिक्र कर नादान ।

तिनके-तिनके से बसता है घर,
घर को बरबाद न कर नादान ।

एक ही खुदा के इंसां हैं सभी,
कुछ खुदा की कद्र कर नादान ।

बाद मरने के कितनी चाहिये ज़मीं,
ज्यादा लालच न कर नादान ।

घर हिंन्दुस्तान, मज़हब है हिन्दुस्तानी,
इस बात से तो न मुकर नादान ।

Monday, August 18, 2008

मेरा अंतस मुझे जान गया !

मैं मुझको पहचान न पाया,
अंतस मेरा मुझे जान गया,
खुद को देना धोखा मुशिकल,
बरबस ही मन ये मान गया ।

पग-पग पर मिल जाये यहाँ पर,
झूठों के अंबार नये,
दुश्मन तो दुश्मन ही ठहरा,
अपने अपनों को मार रहे,
कौन किसी पर करे भरोसा,
सोच के मन परेशान हुआ ।

आग लगी चहुँ ओर स्वार्थ की,
हर शख्स यहाँ हैवान बना,
जीवन में अंधी दौड़ में पड़ के,
इंसा भी शैतान बना,
व्यापार बना है धर्म औ' शिक्षा,
पैसा ही भगवान हुआ,

Sunday, August 17, 2008

पहचान !

ऐ प्रभु

मैंने लाख

कोशिश कर ली

कि

कोई तो

तेरे दिये हुए

इस

नश्वर शरीर को चाहे

कोई तो

प्रकृति-प्रदत्त

मेरी

अच्छाइओं को सराहे

पर

लगता है

तेरे संसार में

नास्तिकों की तादाद

इतनी बढ़ गई है

कि

तेरी कुदरत को

सराहने वालों की

कमी पड़ गई है

पर

मैं फिर भी

इसी कोशिश में

लगा हूँ

कि

मेरे भीतर के

भगवान को

मेरे अंदर

तेरी पहचान को

कोई तो

पहचान पाये

कोई तो

पहचान पाये

Friday, July 18, 2008

मेरी खुशी !

मैं खुश हूँ
तुमने मुझको
मेरी कमियों से
अवगत तो कराया
मुझे
मुझसे ही
परिचित तो कराया
तुम्हारा तात्पर्य तो
कुछ और ही था
पर अनजाने ही
तुमने मुझे
इक रास्ता तो दिखाया
कि
मै स्वयँ को
स्वयँ से
कैसे जीत पाऊँ
अपने
अंदर-बाहर को
कैसे रीत पाऊँ
ये सब
मुझे
तुम्हारी बात से ही तो
समझ में आया
पर
तुम्हारी उस पंगु सोच का
क्या करूँ
जो तुम्हे
केवल मेरी
कमियों के बारे में ही
बताती है
और
तुम्हे अपने बारे में
कुछ नहीं जताती है
मैं तो
विजय पा ही लूँगा
किसी तरह
स्वयँ पर
पर तुम
खड़े ही रहोगे
जिंदगी के इस मोड़ पर
इसी मोड़ पर !

Friday, June 27, 2008

कुछ तुम भूलो, कुछ वो भूलें

गुज़री बातों को याद करो तो क्या मिलना है,
हर रोज ही तो इक बात नई से जी जलना है ।


कितने छाले फोड़ो गे, दिल कितना छोड़ो गे,
खुशियों की सौगात को तुम कितना मोड़ो गे,
जीने को हालात के संग ही तो चलना है ।

कुछ तुम भूलो, कुछ वो भूलें तो बात बनेगी,
ग़र थाम लो उसका हाथ, सुलभ हर राह कटेगी,
वर्ना ठोकर लगने से मुश्किल होगा संभलना ।

Tuesday, June 24, 2008

दौड़ है अँधी जीवन की !

जीवन तो चलता ही जाये, ज्यों उड़ जायें आ काले बादल,
कौन है जाने कल क्या होगा, सोच के तू क्यों है पागल ।

कौन मिलेगा इन राहों में, सब कुछ पहले से तय है,
जीवन की मुश्किल राहों को, करना फिर भी तो तय है,
करते जाओ कर्म को अपने, हँस के करो या रो के करो,
सोच-सोच के फल की बाबत, आगे बढ़ने से न डरो,
सामना करने को दुनिया का, खोल ले तू मन की साँकल ।

इस झूठी दुनिया में मुश्किल सच्चे लोगों का मिलना,
छोड़ो दुनिया के लोगों की, तुम तो सच्चे ही रहना,
बात पते की कहता हूँ मैं, सुनना चाहे न सुनना,
दौड़ है अँधी जीवन की, पर खाली हाथ ही तो मरना,
तृष्णा के पीछे लग कर न बन जाना तू यूँ ही जाहिल ।

Thursday, June 19, 2008

फिर से जी जाता हूँ मैं !

ढंग से जीने के लिये
अनगिनित मौत मरा हूँ मैं
फिर भी
ढंग से जी नहीं पाया हूँ मैं
ज़ख्मों को खुरचते-खुरचते
दर्द सहने की
आदत सी पड़ चुकी है
फिर भी
ज़ख्म भूल नहीं पाया हूँ मैं
कौन जाने
कब कोई किस वक्त
एक और नया ज़ख्म दे जाये
और मैं फिर से
तड़प उठूँ अंदर तक
हाँ, इतना अवश्य है कि
नया ज़ख्म पुराने ज़ख्म को
भुला जाता है
पर एक नया दर्द दे जाता है
और उस दर्द को सहने में
फिर से नई कोशिश में
लग जाता हूँ मैं
और यूँ ही
इक और मौत मर के
फिर से जी जाता हूँ मैं
इक और मौत मरने को !

Friday, June 06, 2008

गीत



कोई मन का मीत मिले तो मैं मन की बातें बोलूँ,
जब अपना ही अपना नहीं तो दिल को कैसे खोलूँ ।

ये खेल समझ नहीं आता,
ऐ तेरा भाग्य-विधाता,
जो करना मैं न चाहूँ,
अनजाने क्यों है कराता,
ग़र दोष समझ में आये, निज-प्रायश्चित थोड़ा रो लूँ ।

मैं तेरा, राह भी तेरी,
फिर कैसे राह मैं भटका,
यह जीवन-रूपी धागा,
तेरी अँगुली में है अटका,
विश्राम मैं थोड़ा पा लूँ, तुम चाहो तो मैं सो लूँ ।

चाहे दीप हो, चाहे बाती,
माटी है, बन जाये माटी,
फिर "मैं" आकार क्यों लेता,
यह बात समझ नहीं आती,
कुछ समझ मेरे जो आये, तो मन का मैल मैं धो लूँ ।

Sunday, May 11, 2008

चलता चल तो राह मिलेगी !

कौन हुआ है दर्द का सम्बल,
कौन हुआ है तेरा अपना,
सब सहलायें छाले अपने,
गौण हुई दूजे की पीड़ा ।



रोना है तो खोना है सब,
दर्द तुझी को होना है सब,
ग़म को पी ले मान के अमृत,
ठौर है इसका और कहाँ ।



नहीं राह पर काँटें मिलेंगें,
सोच, अगर हम नहीं चलेंगें,
जीवन में तो हारेंगें ही,
मंजिल भी हमको मिले कहाँ ।



चल उठ फिर खा कर ठोकर,
छोड़ न रस्ता हिम्मत खोकर,
चलता चल तो राह मिलेगी,
सोच में तू बेकार पड़ा ।





Monday, May 05, 2008

कैसे करूँ मैं शुक्रिया !

कैसे
शुक्रिया करूँ मैं
उन लोगों का
जिन्हे मैं
न तो
समझ ही पाया
और न ही
झेल पाया
पर
अनजाने ही
उन्होने मुझको
दोस्तों,
दुश्मनों
एवँ
रिश्तेदारों
के रूप में
सही-गल्त में
फर्क करना
है सिखलाया
उन्होने ही तो
मुझे
पग-पग पर
फिर से
ठोकर खाने से
है बचाया
इसलिये
उन लोगों से ज्यादा,
जो हरदम
मेरा
सम्बल बने हैं,
ऐसे ही लोगों का
एहसानमंद
रहूँगा मैं
और
करता रहूँगा
उनका
सौ-सौ बार
शुक्रिया मैं !
शुक्रिया मैं !!

Sunday, May 04, 2008

समझ नहीं पाता हूँ !

समझ नहीँ पाता हूँ
किस-किस को
कितनी-कितनी बार
माफ करूँ मैं
या फिर
हर बार ही
हिसाब साफ करूँ मैं
समझ नहीं पाता हूँ
क्या
लोगों की गल्तियाँ
दरनिकार करना
मेरी मज़बूरी है
या फिर
फितरत है मेरी
हो सकता है
गल्ती की
प्रतिक्रिया में
गल्ती करना
सुहाता न हो मुझे
और मैं
अनजाने ही
दूसरों की गल्तियाँ
माफ कर बैठता हूँ
पर
इससे क्या
मैं उसको
बढ़ावा नहीं दे जाता हूँ
और
वो फिर से
एक और गल्ती
कर जाता है
और मैं
फिर से
स्वयँ को
अवश ही पाता हूँ
प्रतिक्रिया करने में
यूँ
ये सब बढ़ता ही जाता है
अब तुम्ही कहो
ऐसे में
मैं क्या करूँ
मूक रह कर
अवशता ही दर्शाऊँ
या फिर
चुपचाप
किनारा ही कर लूँ !
ताकि
बार-बार
ऐसी अवस्था का
सामना न करना पड़े !!

Friday, May 02, 2008

हर शख्स को पता है!

हर शख्स को पता है
कहाँ खता है उसकी
पर मानने को कुछ भी
तैयार वो नहीं है
सौ-सौ दलीलें देता
अपनी ख़ता को ले कर
नहीं जानता है लेकिन
ग़ल्ती को मान लेना
पछताने से है बेहतर
रिश्तों की नींव होती
कुछ दे के, कुछ है लेना
ग़र मेरी तुम सुनो तो
मुझको भी कुछ है सहना
नहीं राजनीति खेलो
अपनों के बीच बंदो
ग़र दे सको किसी को
थोड़ा सा प्यार दे दो
सबका है भाग्य अपना
कोई ऊँचा, कोई नीचा
दौलत है आनी-जानी
नहीं तुमने क्यों ये सीखा
सिर पत्थरों के आगे
झुकते हैं बिन शर्त के
कहीं डर, कहीं है लालच
प्रपंच हैं मतलब के
कहते हैं छुप के बैठा
हर शख्स में ख़ुदा है
भगवान की है नेमत
दुनिया में बस बंदा है
फिर भी जो मारो ठोकर
सबसे बड़ी खता है
पहुँचे गा क्या ख़ुदा तक
ख़ुदा का होके बंदा
जो नाम पे ख़ुदा के
करता है रोज धंधा
दूजे को दोष देना
होता बहुत आसां है
अपनी कमी यहाँ पर
दिखती हमें कहाँ है
अपने कर्म का लेखा
जो खुद ही देख पायें
तो दोष सारे अपने
हम खुद मिटा पायें



Tuesday, April 29, 2008

सच कहने से वो बिगड़ते हैं !

हम तो सीधी सी बात कहते हैं,
वो तो कुछ और ही समझते हैं ।

जिनको रिश्ता निभाना आता नहीं,
वो बिना बात के अकड़ते हैं ।

शिकवा-गिला कोई करे कैसे,
सच कहने से वो बिगड़ते हैं ।

बात बनती रहे, बिगड़ती रहे,
यूँ ही तो साथ-साथ चलते हैं ।

दर्द का माप नहीं होता कोई,
अपना पैमाना सभी रखते हैं ।

नहीं मुश्किल है ज़ख्म देना कभी,
बड़ी मुश्किल से पर ये भरते हैं ।

Saturday, March 15, 2008

अपनी-अपनी खुशी!

तुम्हारी दोगली फितरत का
तो मैं तभी कायल हो गया था
जब तुम वादा करके
अगले ही पल
मुकर गये थे
मैं फिर भी
तुम्हे आज़माता रहा
तुम्हारा हमदम बन
तुम्हारा हर दर्द
सहलाता रहा
सोचता रहा
कभी तो तुम्हारा
ज़मीर जगेगा
कभी तो कोई
तुम्हे भायेगा
जिसे तुम्हारी वफा का
एहसास होगा
पर क्या जानता था
तुम अपनी
फितरत से मजबूर थे
मैं अपनी
आदत से परेशान था
तुम ज़फा करके खुश थे
और मैं
अपनी वफा में खुश
दोनों को
अपनी-अपनी खुशी में
खुश रहना ही अच्छा है!

Thursday, March 06, 2008

मैं हूँ एक बीता हुआ युग!

मैं हूँ एक बीता हुआ युग!
किसे चाहिये अब बीता युग!!
सदा रहा मैं ढूंढता,
खो चुके पदचिन्ह यहाँ,
धूल से अटे मिले,
कौने में पड़े 'मूल्य' यहाँ!
मैं हूँ एक बीता हुआ युग!
किसे चाहिये अब बीता युग!!
भिक्षुकों की भाँति मैं,
खड़ा रहा कतार में,
काश! कोई भूल से,
प्रीत दे उधार में!
मैं हूँ एक बीता हुआ युग!
किसे चाहिये अब बीता युग!!

Friday, February 22, 2008

मेरी-तुम्हारी व्यथा!

कल
जब कोई
मेरी कविता पढ़ेगा
तो शायद
हँसेगा !
अपनी अन्तर्व्यथा को
दो शब्दों में
उँडेल कर
कुछ कह देना ही
क्या कविता है?
संसार में क्या
अपनी व्यक्तिगत
व्यथा ही है
किसी और की
व्यथा नहीं है क्या
क्या रात के बाद
दिन नहीं आता है क्या
सूर्य
अंधेरा नहीं
निगल जाता क्या
जैसे
दिन और रात
अंधेरा और रौशनी
एक दूसरे से
जुड़ कर
पर्याय बन चुके हैं
वैसे ही
मेरी व्यथा
तुम्हारी व्यथा से
कहीं न कहीं जुड़ कर
उसकी पर्याय बन चुकी है
केवल समय का
अन्तराल ही
इन्हे जुड़ने नहीं देता
जिस दिन
मेरी व्यथा
तुम्हारी व्यथा से
जुड़ जायेगी
और
पर्याय बन पायेगी
उस दिन
तुम स्वत: ही
इसे
कविता मानोगे
चाहे
ऐसा हो या न हो!


Wednesday, February 20, 2008

मेरा सम्बल !

मेरे
अकेलेपन ने
यदि
मुझे डसा है
तो
मेरा सम्बल भी तो
बना है
मेरे
अंधकारमय जीवन का
ज्योतिर्पुंज बना है
वही
जो मुझे
सूर्य का प्रतीक बता
शनै-शनै
मेरे
प्रकाश को
लील रहे थे
मेरे
ज्योतिहीन होते ही
न जाने कहाँ
अनंत गहराईयों में
विलीन हो गये
अब तो कहीं
आशा के सितारे भी
दिखाई नहीं देते हैं
और मैं
भटक रहा हूँ
अंतरिक्ष की
सूनी गहराईयों में
बस अकेला ही
अब
मेरा ये
अकेलापन ही तो
मेरा सम्बल है !

Monday, February 18, 2008

आधे-अधूरे रिश्ते!

आधे-अधूरे रिश्ते
जिये नहीं जाते
जल्दी ही हैं मर जाते
इसलिये
ऐसे रिश्तों को
जीने से क्या फायदा
कोई भी रिश्ता
तभी है निभता
जब उसे निभाने को
कोई हो मरता
किसी को भी
केवल
अच्छाईयों के साथ
तो
स्वीकार नहीं किया जा सकता
उसकी
कमियों को भी तो
साथ में लेना है पड़ता
क्योंकि
इक-दूसरे की
कमियों को
इक-दूसरे की
बुराईयों को
एक साथ
निभा पाना ही तो
रिश्ते की परिभाषा है
साथ रहने की
अभिलाषा है
और
इक-दूसरे को
समझने की
मूक भाषा है!

Saturday, February 16, 2008

कोई समझ दे!

कुछ लोगों का
दूसरे को हरदम
झूठा मानना
और
स्वयँ को सच्चा
दूसरे को हरदम
सुखी मानना
और
स्वयँ को दुखी
दूसरे को हरदम
ग़ल्त मानना
और
स्वयँ को सही
ऐसे व्यवहार को
क्या कहें हम
इन्सानी फितरत
या
बनावटी सूरत
बाहर से कुछ
और
अंदर से कुछ
या फिर
हरेक की
अपनी 'मैं'
इन्सानी रिश्तों में
सिर उठाती है
हरदम टकराती है
कदम दर कदम
और
जाती नहीं
जब तक
निकले न दम
बाद मरने के तो
ख़त्म हो जायेगी
'मैं' और 'तुम'
फिर
छोड़ते क्यों नहीं
जहाँ में रहते
'मैं' को
नहीं समझ पाये हैं
अब तक हम
ग़र कोई समझा पाये
तो शायद समझ पायेंगें हम!

Friday, February 15, 2008

"बच्चों का कोना"

(1)
काली मक्खी, काली मक्खी,
तूने क्यों मेरी टाफी चखी,
तेरे पर जो काटूँ रानी,
याद आयेगी तुझको नानी,
भूल जायेगी घर का रस्ता,
नहीं पड़ेगा सौदा सस्ता,
इसलिये मेरी बात ये मानो,
दूजे की चीज पर नजर न डालो ।
(2)
छोटे-छोटे हम हैं बच्चे,
मत समझो हमें अक्ल के कच्चे,
हम अलबेले, नहीं अकेले,
बात-बात पर लड़ करके भी,
साथ रहें हम, सब साथ चलें,
देश में फूट पड़ाने वालो,
घर के टुकड़े बंटाने वालो,
अपनी अक्ल न काम करे तो,
बच्चों से कुछ अक्ल जुटा लो ।
(3)
रिम-झिम, रिम-झिम पानी बरसा,
मेंढ़क नहीं पानी को तरसा,
टर्र, टर्र, टर्र, टर्र, शोर मचाये,
उछले-कूदे नाच दिखाये,
ठंड बड़ी मुशिकल से काटी,
गर्मी नहीं है साथ निभाती,
पानी की बौछार जो आई,
खिल गया मन, पा मन भाता साथी ।

"दिशा"


ईसा मसीह
तुमने तो
सलीब से
लटक कर
मुक्ति पा ली थी
और
संसार को
एक दिशा दी थी
मैं तो
सलीब को
अपने काँधे पर
उठाये
भटक रहा हूँ
दिशाहीन
भला किसे
दे पाऊँगा
मैं दिशा
जब भी मैं
कोई ऐसा
प्रयास करता हूँ
तो
एक और कील
ठोंक दी जाती है
मेरे अवश शरीर में
और मैं
फिर से
दिशा भटक जाता हूँ!
बस
भटकता ही जाता हूँ!!

Thursday, February 14, 2008

वेलेंटाईन क्या प्यार का प्रतीक है?

प्यार तो
एक अनुभूति है
जो
धड़कनों में
बसती है
इसे केवल
महसूस
किया जाता है
न कि
सरेआम
प्रकट किया जाता है
प्यार
मन का
संबल है
ठहरे समुंदर की
हलचल है
इसमें
भावना की
लहर उठ कर
मन को
हिलोरे दे जाती है
पर
आजकल तो
प्यार को
एक तमाशा
बना दिया गया है
कोई तुम्हे
प्यार करे न करे
उसे इक फूल दे कर
वेलेंटाईन
बना दिया गया है
और
वेलेंटाईन के
संदेश
टीवी, इंटरनेट पर
दे कर
किसी की
इज्जत को ही
निशाना
बना दिया गया है
दस-दस फूल
दस-दस को
बाँट कर
हरेक को
वेलेंटाईन
बना दिया गया है
ग़र किसी से
प्यार है तो
तो है
उसके लिये
वेलेंटाईन का
तमाशा
क्यों
खड़ा करें
प्यार तो हर पल
हर क्षण है
क्यों किसी
खास दिन का
चयन करें
ग़र प्यार है
तो
प्रेमी का
हर दिन ही
तो
वेलेंटाईन है
इसलिये
आओ
भेड़चाल छोड़
अपनी संस्कृति
को ही
याद रखें
और
अपनी वेलेंटाईन
को
दिल में ही
आबाद रखें!

Wednesday, February 13, 2008

कितने रावण?

ऐ रावण,
यदि तुम तक
मेरी आवाज
पहुँच रही हो तो
मेरा एक संशय
दूर कर दो
तुम्हारा तो
राम ने
वध किया था
फिर से
कैसे
जीवित हो जाते हो?
यदि ऐसा नहीं तो
हर वर्ष
तुम्हारा पुन:
वध कर
क्यों जलाया है तुम्हे?
और फिर
कैसे
पुन: जीवित हो उठते हो?
तुम्हारे तो केवल
दस सिर थे!
कहाँ से लाते हो
इतने सिर
जिसे आज का
हर व्यक्ति
उठाए घूम रहा है
अपने कांधे पर
तुम्हे तो
मै फिर भी
मार लूंगा
पर
उनका क्या करूँ
जो
तुम्हारा सिर लगाये
विचर रहे हैं
राम की
वेशभूषा में
यहाँ-वहाँ!
जहाँ-तहाँ!!

Monday, February 11, 2008

ये ॠतु वसंत है!

धरा है आज खिल रही,
ब्यार भी मचल रही,
ये ॠतु वसंत है!
आज फिर वसंत है!!

डाली-डाली प्यार में,
गुफ्तगू है कर रही,
अधखिली कली भी,
खेल भँवरों से है कर रही,
काँटों से गले क्यों आज,
हर कली है मिल रही,
ये ॠतु वसंत है!
आज फिर वसंत है !!

किरण-किरण महक उठी,
बुलबुलें चहक उठीं,
बहार के ख़ुमार से,
जवानियाँ बहक उठीं,
संयम से जो बनाई थी,
वो नींव आज हिल रही,
ये ॠतु वसंत है!
आज फिर वसंत है!!

सब का मन विभोर है,
चारों और शोर है,
पर मेरा है मन बुझा,
न आया चितचोर है,
मुझको जो हँसा सके,
कमी है उसकी खल रही,
ये ॠतु वसंत है!
आज फिर वसंत है!!

Wednesday, February 06, 2008

गीत

दरमियाँ रहेंगें हम मुसीबतों के तो बनेंगें रास्ते,
जहाँ में कौन आज तक लड़ा किसी के वास्ते ।
चले जा, तू चले जा,
आज वक्त से लड़े जा,
जो सोच में पड़ेगा,
वक्त पीछे छोड़ देगा,
वक्त पीछे छोड़ देगा,
तू न दिल को छोड़ देना,
तू न दिल को छोड़ देना,
चाहे हों कहीं पे हादसे।
दरमियाँ रहेंगें हम मुसीबतों के तो बनेंगें रास्ते,
जहाँ में कौन आज तक लड़ा किसी के वास्ते ।
नहीं हार मानना तू,
न हथियार डालना तू,
राह तब तुझे मिलेगी,
चाह जब तेरी जगेगी,
चाह जब तेरी जगेगी,
पीछे मुड़ के तुम न देखो,
पीछे मुड़ के तुम न देखो,
चाहे तय न हो ये फासले ।
दरमियाँ रहेंगें हम मुसीबतों के तो बनेंगें रास्ते,
जहाँ में कौन आज तक लड़ा किसी के वास्ते ।

Thursday, January 31, 2008

गज़ल!

दोस्तों की दोस्ती तो देख चुके,
दुश्मनों से ज़फा निभायेगें ।

अश्कों ने साथ मेरा छोड़ दिया,
अब तो हँस के ही ग़म उठायेंगें ।

ज़ख्म खाने से तो गुरेज़ नहीं,
मरहम ग़र उस पे वो लगायेंगें ।

लाख रौशन करो अँधेरों को,
दिल मेरा फिर भी वो जलायेंगें ।

सब्र होगा तभी हसीनों को,
जब ज़नाजा मेरा उठायेंगें ।

Wednesday, January 30, 2008

गज़ल!

ख़ुद को इतना न गिराओ कि कोई उठा न सके,
आग इतनी न लगाओ कि कोई बुझा न सके ।

रफ्ता-रफ्ता करके तो रिश्ता तरश्ता है,
चोट इतनी न लगाओ कि फिर से बना न सकें ।

दर्द तो होती है सुई की नोक से भी,
ज़ख्म ऐसे न बनाओ कि कोई भरा न सके ।

किसी को दोष बिना वजह तुम देते क्यों हो,
बददुआ को तो कोई भी दुआ बना न सके ।

अब तो आदत सी पड़ चुकी है चोट खाने की,
गहरी चोट भी कोई असर दिखा न सके ।

Wednesday, January 23, 2008

आवश्यकता!

क्यों हमेशा हम
साबित करना चाहते हैं
खुद को
जग के सामने
जो हम हैं
सो हैं
इसे साबित करने को
क्या हमें
कोई तदबीर चाहिये
हाँ
हम तो ये जानते ही हैं
भली-भांति
कि हम
अंदर से क्या
और
बाहर से क्या हैं
पर फिर क्यों
जो हम
वास्तव में हैं
वो नहीं लाना चाहते
दुनिया के सामने
हम तो बस
अपनी अच्छी छवि को ही
पेश करते हैं
दूसरों के सामने
चाहे अंदर से
कुछ भी हों
तो क्या ये
एक अहंतुष्टि है
या फिर
जग को
धोखा देने की कोशिश
तुम तो शायद
जानते ही होगे
पर
आज नही तो कल
तुम्हारी असलियत का
पता लग ही जायेगा
इस जग को
तो कैसे दिखाओगे
अपना मुँह जग को
या फिर
उसे भी
चिकनी-चुपड़ी बातों से
ढाँपने की
कोशिश करोगे
इससे तो
तुम्हारा असली रूप
और जग जाहिर होगा
तो क्यों न
वैसे ही रहो
जैसे तुम हो
और दुनिया को
निर्णय करने दो
कि तुम क्या हो
फिर
आवश्यकता नहीं रहेगी
तुम्हे भी
खुद को
साबित करने की!

Friday, January 18, 2008

कैसे निभे?

रिश्तों में
गरमाहट तो
तभी आयेगी
जब कोई
रिश्तों के लिये जले
कदम से कदम
तभी मिल पायेंगें
जब कोई
साथ चले
और
दुनिया में
किसी से
तभी निभेगी
जब हम
एक-दूसरे के
अनुरूप ढलें
जब हम
न तो
रिश्तों में जलें
न ही
एक-दूसरे के
साथ चलें
और
न ही
एक-दूसरे के
अनुरूप ढलें
तो कहो
कोई भी रिश्ता
कैसे चले?

Tuesday, January 15, 2008

गज़ल!

सरेआम दोस्ती करो, सरेआम दुश्मनी,
जो कुछ नहीं है मन में तो क्यों नज़र झुकी ।

हर वार पे ज़रूरी तो नहीं है वार कर,
कभी तो वक्त आयेगा वो चूकेगा कहीं ।

तू बार-बार हार के ना हारना ये मन,
कोशिशें करे जा , रंग लायेंगीं कभी ।

पहचान अपने मन को, मन ही तो साथी है,
है स्वार्थी ये दुनिया, तेरा कोई नहीं ।

हर रास्ते को दुनिया तो बतायेगी ग़ल्त,
ये तेरा फैसला है, तू सही है या नहीं ।

Wednesday, December 26, 2007

कोई समझा दे!

कुछ लोगों का
दूसरे को हरदम
झूठा मानना
और
स्वयँ को सच्चा
दूसरे को हरदम
नीचा मानना
और
स्वयँ को ऊँचा
दूसरे को हरदम
मूर्ख मानना
और
स्वयँ को अक्लमंद
दूसरे को हरदम
सुखी मानना
और
स्वयँ को दुखी
दूसरे को हरदम
ग़ल्त मानना
और
स्वयँ को सही
ऐसे व्यवहार को
क्या कहें हम
इन्सानी फितरत
या
बनावटी सूरत
बाहर से कुछ
और
अंदर से कुछ
या फिर
हरेक की
अपनी 'मैं'
इन्सानी रिश्तों में
सिर
उठाती है हरदम
टकराती है
कदम दर कदम
और
जाती नहीं
जब तक
निकले न दम
बाद मरने के
तो
ख़त्म हो जायेगी
'मैं' और 'तुम'
फिर
छोड़ते क्यों नहीं
जहाँ में रहते
'मैं' को हम
नहीं समझ पाये हैं
अब तक हम
ग़र कोई
समझा पाये
तो शायद
समझ पायेंगें हम!

Thursday, December 20, 2007

अपनी खुशी!

अपनी खुशी
ढूँढने
निकला था
जग में मैं
पर चहूँ और
दिखाई दिया
दुख ही दुख
कोई
भूख से दुखी
तो कोई
न खा सकने से दुखी
कोई
गरीबी से बेहाल
तो कोई
पैसा नहीं
सकता संभाल
कोई
किसी को
पाने की चाह में
कोई
किसी को पा कर
खोने की राह में
तो फिर
खुशी है कहाँ
ग़र दुखी है
सारा ही जहाँ
सोच में
पड़ गया मैं
पर
सोचने की
क्या ज़रूरत थी
जिस खुशी के लिये
भागता रहा
ता-ज़िंदगी
इधर-उधर
वो तो
अपने ही
भीतर थी बसी
बस उसे
थोड़ा सा
टटोलने की
थोड़ा सा
कुरेदने की
ज़रूरत थी !

Wednesday, December 19, 2007

बुरा मत मानना!

अगर मैं
ये कहूँ
कि मैं
किसी का
दोस्त नहीं
तो
बुरा मत मानना
उम्र के
इस पड़ाव पर
पहुँच कर
मुझे
ऐसा बनना ही पड़ा
ज़िंदगी के
टेढ़े-मेढ़े
ऊबड़-खाबड़
रास्तों ने
जो मुझे
सिखाया है
उससे शायद
यही
निचोड़ निकला है
कि
आज़ की दुनिया में
कोई किसी का नहीं
दोस्त होना तो
अलग बात है
इसलिये
मैंने भी
अपने बारे में ही
सोचना
शुरू कर दिया
अपनी ही
अपनी भावनाओं की
कद्र करने लग गया
नतीज़तन
मैं
अपने सिवा
किसी का
नहीं रहा
इसलिये किसी का
दोस्त भी
नहीं रहा
पर
इसके लिये तो
तुम
खुद जिम्मेदार हो
फिर मुझे दोष
क्यों देते हो!

Wednesday, December 12, 2007

सम्पूर्णता!

दुनिया में
कोई भी तो
सम्पूर्ण नहीं है
यदि ऐसा होता
तो दुनिया से
अधर्म न मिट जाता
कोई भी
कभी कोई
गल्ती न करता
मैं भी तो
सम्पूर्ण नहीं हूँ
इसलिये शायद
अपनी बात
सही तरीके से
न कह पाऊँ
पर कोई भी तो
सम्पूर्ण नहीं है
हरेक में
कोई न कोई
कमी तो है
किसी में
ज्यादा अच्छाईयाँ हैं
किसी में
ज्यादा बुराईयाँ
पर दोनों में
तालमेल तो
बिठाना ही पड़ता है
नहीं तो
दुनिया में
रहना दूभर हो जाता है
किसी ने
सही ही तो कहा है
कि
दूसरे की
कमी देखने से पहले
अपनी कमी भी देखो
यदि तुम
किसी की कमी को
अनदेखा नहीं करते
तो तुम्हारी कमी
कोई क्यों सहन करेगा
इक-दूजे के साथ
चलने के लिये
इक-दूजे को
सहन तो करना ही पड़ेगा
इक-दूजे को
सहारा तो देना ही पड़ेगा
तभी तो कोई
रिश्ता निभेगा
तभी तो
समाज बनेगा
और
आगे चलेगा
चलता ही रहेगा !

आधे-अधूरे रिश्ते!

आधे-अधूरे रिश्ते
जिये नहीं जाते
जल्दी ही
हैं मर जाते
इसलिये
ऐसे रिश्तों को
जीने से
क्या फायदा
कोई भी रिश्ता
तभी है निभता
जब उसे
निभाने को
कोई हो मरता
किसी को भी
केवल
अच्छाईयों के साथ
तो स्वीकार नहीं
किया जा सकता
उसकी
कमियों को भी
तो साथ में
लेना है पड़ता
क्योंकि
इक-दूसरे की
कमियों को
इक-दूसरे की
बुराईयों को
एक साथ
निभा पाना ही
तो
रिश्ते की
परिभाषा है
साथ रहने की
अभिलाषा है
और
इक-दूसरे को
समझने की
मूक भाषा है!

Monday, December 03, 2007

बदला!

मैंने तुमसे
अपने एहसानात का
हिसाब तो नहीं माँगा था
फिर क्यों
नज़रें चुराते
फिर रहे हो मुझसे?
क्या दुनिया का
दस्तूर निभा रहे हो?
दस्तूर -
बेवफाई का
दस्तूर -
काम निकल जाने पर
अंगूठा दिखलाई का
या फिर
औरों की तरह
तुम्हारी भी
ये फितरत ही है
मैंने तो
जो किया
रिश्तों की,
इन्सानियत की
खातिर किया
या फिर
यूं समझो
जो मुझे उचित लगा
वो ही किया
तुम क्यों
बेकार ही
डरने लगे मुझसे
कि शायद
तुम्हे कुछ
लौटाना न पड़ जाये मुझे
समझ नहीं पाया हूँ मैं
तुम
तकलीफ से
डरते हो
या फिर
स्वार्थपरता के
जाल में उलझे हो
कुछ भी हो
कभी न कभी तो
तुम्हे तुम्हारी
कमी का
ख्याल आयेगा ही
ग़र ऐसा हो तो
मुझे मेरे
एहसानात का
बदला स्वयँ ही
मिल जायेगा!
सभी कुछ
स्वयँ ही मिल जायेगा!!



Wednesday, November 28, 2007

गल्तफहमी!

ज्यादातर कोई
खुश
तभी रह पाता है
जब वो
गल्तफहमी में रहता है
गल्तफहमी
अपने बारे में
कि
लोग क्या सोचते हैं
उसके बारे में
गल्तफहमी
अपने बारे में
कि
वो क्या है
गल्तफहमी
रिश्तों के बारे में
कि
कोई किसी से
प्यार करता है
या
किसी पर मरता है
गल्तफहमी
किसी की
इमानदारी की
किसी की
वफादारी की
और न जाने
कैसी-कैसी
गल्तफहमियाँ
पाले बैठा है हर कोई
और
उन्ही में
खुश रहता है हर कोई
लेकिन जब
सच्चाई का
एहसास होता है
तो ज्यादा नहीं तो
थोड़ा तो
दुख होता है
वो अलग बात है
कि खुश रहने को
कोई
कोई और गल्तफहमी
पाल लेता है!

Friday, November 23, 2007

साथ चलो!

कौन बनेगा उनका अपना,
जो बस अपनी बाबत सोचें,
मैं तो खाली मैं ही होती,
हम में तो कितने मैं होते ।

साथ चलोगे दुनिया के,
तो दुनिया तेरे साथ चलेगी,
अकेले चलने वालों के संग,
दुनिया वाले कभी न होते ।

सोच है मेरी सबसे न्यारी,
ग़र सोचे ये दुनिया सारी,
तो जितने हैं रिश्ते-नाते,
तिनके-तिनके बिखरे होते ।

ग़र तुमको ऊपर उठना है,
नीचे भी तो देखो भाई,
चलना मुश्किल हो जाता,
ग़र धरती पे ये पाँव न होते ।

दर्द से दर्द मिला करता है,
खुशियाँ बाँटो खुशियाँ आयें,
फूल नहीं उगते हैं वहाँ पर,
जहाँ पे तुम हो काँटे बोते ।

Tuesday, November 20, 2007

अपनों को गैर तो न मानो!

प्यार को बंधन तो न मानो,
हँसी को रूदन तो न मानो,
कौन रहेगा वर्ना अपना,
सबको दुश्मन तो न मानो ।

दर्द तो सब के दिल में है,
रहना लेकिन दुनिया में है,
दर्द को बाँटना भी सीखो,
इसे केवल अपना तो न मानो ।

मुश्किलों के दायरे में खड़े हो,
तो शशोपंज में क्यों पड़े हो,
जिंदगी जिंदादिली से जियो,
जिंदगी से हार तो न मानो ।

कदम बढ़ाओ तो रास्ता तय होगा,
बात करो तो मामला तय होगा,
यूँ ही चुपचाप रह करके,
खुद को ही सही तो न मानो ।

खुद ही सवाल उठा करके,
खुद ही जवाब दे लेते हो,
अपने सवालो और जवाबों को,
अपनी दुनिया तो न मानो ।

पथिक और भी राहों में,
चल रहे अकेले हैं,
अकेले चलते रह करके,
सफर को तय तो न मानो ।

तुम्हारी दुनिया माना कि,
ज़ुदा है सारी दुनिया से,
पर रह करके अलग सबसे,
अपनों को ग़ैर तो न मानो ।

Sunday, November 18, 2007

ये कैसा संसार!

दो अलग-अलग
राहों पर
चलते राही
मिल कर
एक हो जाते हैं
और बन जाते हैं
एक राह के राही
बिना कोई पूर्व रिश्ते के
जब दो इंसा
एक बंधन में
बंध जाते हैं
तो कोई तो आधार
होगा ही
कहीं तो
प्यार होगा ही
पर
दूसरी और
एक राह पर
चलते राही
अलग-अलग राहों पर
चल निकलते हैं
और
जन्म ले साथ-साथ
बचपन-जवानी
काटे साथ-साथ
कभी-कभी
बन जाते हैं
इक-दूसरे के
खून के प्यासे
इसका कोई आधार है क्या?
कभी सोचा है क्या?
आधार तो
दोनों स्थतियों का है
एक का आधार
है प्यार
इक-दूसरे की
कमियों को
करना स्वीकार
और
जीवन तक
कर देना न्यौछावर
दूसरे का आधार
है दुराचार
अनाचार
और
ऐसा व्यवहार
जो दर्शाता हो
कुत्सित विचार
या फिर
जब रिश्तों का
लालच हो आधार
इंसा वही
रिश्ता वही
फिर भी
अलग-अलग
जब हो व्यवहार
तो
फिर सोचने को
मजबूर होना ही पड़ता है
कि
ये कैसा संसार !

Saturday, November 17, 2007

अपनी राह चलो!

लोग
तुम्हे क्या समझते हैं
वो
इतना महत्वपूर्ण नही
जितना महत्वपूर्ण ये है
कि
तुम खुद को
क्या समझते हो
नहीं तो
तुम अपना
अस्तित्व भी
खो दोगे
और जो तुम हो
वो भी
नहीं रहोगे
जो तुम
बनना चाहते हो
बन नहीं पाओगे
जो तुम
कहना चाहते हो
कह नहीं पाओगे
करना चाहते हो
कर नहीं पाओगे
इसलिये
अपनी मंजिल पाने को
अपनी राह
चलते रहो
रस्ते खुद-ब-खुद
तुम्हारे साथ चलेंगें
लोग खुद-ब-खुद
तुम्हारी बात सुनेंगें
और
तुम्हारी बात करेंगें
और फिर स्वयँ ही
तुम्हारे पीछे चलेंगें!

आज का इन्सान!

आज का इंसान
बड़ा ही विचित्र है
यूँ तो
किसी का दुश्मन नहीं
पर न ही
किसी का मित्र है
उसके मन में तो
बस
एक ही चित्र है
कैसे
अपने सामने वाले को
अपने से
छोटा साबित करूँ
कैसे उसको हराऊँ
यदि ऐसा हो तो
शायद मैं उसका
स्थान पा जाऊँ
पर
क्या ये आवश्यक है
कि खुद को
बड़ा साबित करने को
दूसरे को छोटा कहें
खुद को
धनवान करने के लिये
दूसरे को निर्धन करें
खुद की बुराई ढाँपने को
दूसरे की अच्छाई को
बुरा कहें
वो
यह भूल जाता है कि
समाज में
छोटे-बड़े
अच्छे-बुरे का मापदंड
केवल उसे ही नहीं
तय करना है
इससे वो
अपनी हीनभावना ही
जगजाहिर करता है
अच्छा हो कि
खुद को
दूसरे से
ऊँचा साबित करने को
अच्छा बनने को
वो अपने रास्ते
खुद बनाये
न कि
दूसरे के रास्ते में
काँटें बिछाये
और अपनी मंजिल पर
खुद पहँच जाये
तब
उसकी ऊँचाई
उसकी अच्छाई
सब को
खुद ही दिखाई देगी
तब उसे
खुद को
दुनिया पर साबित करने की
आवश्यकता नहीं होगी
दुनिया खुद ही
उसके पीछे होगी !

Friday, November 16, 2007

प्रवृति!

यह
कल शाम ही की बात है
जब
शमशान के पास से
गुजरते हुए
एक बार फिर
आकाश को
तपते हुए देखा मैंने!
कुछ लोग
हाथ बाँधे
मौन खड़े थे
शायद
ठिठुरते मौसम में
बुझते दिए की
अंतिम लौ से भी
तपिश लेने की
कोशिश में!
और कुछ
(जो शायद अपने थे)
लाल आँखें लिये
दूर बैठे थे
झुलस रहे थे वो
ठंडी हो रही
आग से भी!
और
कोने का बूढ़ा बरगद
निर्विकार सा खड़ा था
सदियों से
बार-बार
दोहराई जा रही
इन्सान की
दोगली प्रवृति का
मूक दर्शक!

Thursday, November 15, 2007

कमी!

कोई ग़र
जमाने से
झूठ बोले
तो
बात समझ में आती है
कोई ग़र
खुद से
झूठ बोले
तो
बात समझ नहीं आती है
क्या
खुद को खुद से
छुपाना कभी संभव है?
यह असंभव ही नहीं
बल्कि नामुमकिन है
फिर जाने क्यों
लोग
ऐसा करते हैं
और
खुद को
मुगालते में
रखते हैं
जब कि
वो यह नहीं जानते हैं
कि
जिस बात को
वो स्वयँ से
छुपा रहे हैं
शायद
जमाने ने
उसे भांप लिया हो
और
उसकी इस कमजोरी का
फायदा भी
उठा लिया हो
इसलिये ये
निहायत ज़रुरी है
कि
अपनी कमी
न केवल
अपने से न छुपाओ
बल्कि
जमाने से भी न छुपाओ
शायद कोई तुम्हे
सही रास्ता दिखा जाये
और तुम
अपनी कमी पर
विजय पा जाओ!

आगे ही बढ़ना है !

अस्त-व्यस्त से ख्यालों को
कैसे व्यवस्थित करूँ
समझ नहीं पाऊँ
हर तरफ मची है
आपा-धापी
चहूँ और व्याप्त है
अनचाहा शोर
कोई किसी को
लूटने में व्यस्त है
कोई बना है
शातिर चोर
क्या समाज की
यही तस्वीर
थी हमने देखी
समझ नहीं पाऊँ
फिर भी
सोचता हूँ
इस अफरा-तफरी में
कुछ तो कर जाऊँ
कुछ तो कह जाऊँ
जिससे
कोई तो सोचे
सही क्या है
और ग़ल्त क्या है
इस सब भाग-दौड़ का
मतलब क्या है
हम क्यों यूँ ही
इक-दूसरे की जड़ें
काटने में लगे हुए हैं
यदि यूँ ही
चलता रहा
तो
कल हम
कहाँ पहुँचेंगें
क्या सोचा है
किसी ने
दो कदम आगे
और
चार कदम पीछे
जहाँ से चले थे
कल वहीं पर
खुद को
खड़े पायेंगें
तो फिर से
सोच लो
क्या पाना है
तुम्हारी क्या
चाहना है
अगर आगे बढ़ना है
तो
दूसरे को भी
आगे बढ़ाना है
इसी को कह पायेंगें
इसी से कर पायेंगें
हम प्रगति
आगे ही बढ़ाना है!
और
आगे ही बढ़ना है!

Wednesday, November 14, 2007

"मन हरदम यही कहता है "

मन हरदम यही कहता है, कुछ ऐसा हो, कुछ वैसा हो,
लेकिन फिर सोचने लगता है, जाने जीवन में कैसा हो ।

जो होता है, सो होता है, काहे तू चैन को खोता है,
हर छोटी-छोटी बात पे पगले, काहे बैठ के रोता है ।

दो पग चल कर के देख जरा, रस्ते खुद ही आ जायेंगें,
चाहे पहाड़, चाहे नदिया, खुद ही पीछे हट जायेंगें ।

होता गुनाह जी छोड़ना है, इसमें संशय की बात नहीं,
जो सुबह में कभी न ढलती हो, ऐसी कोई भी रात नहीं ।

है कौन किसी का दुनिया में,सब अपने पथ के राही हैं,
यूँ व्यर्थ सोच में पड़ना है, तू अपनी नाँव का माँझी है ।

चंदा तारे न तोड़ सके, तो खुद को छोटा कहना मत,
जो कुछ भी तेरे बस में हो, उससे तू पीछे रहना मत ।

कोई आंधी, तूफां कोई , बस सीना तान के चलना है,
न डरना कभी भी मुशिकल से, बस एक ही बार तो मरना है ।

खुद को दीए की लौ बना, खुद जल के रौशन कर जग को,
कुछ ऐसा करके जग से जा, हरदम तू याद रहे जग को ।

Friday, November 09, 2007

आओ एक दीप जलाएँ!

दीवाली तो
हर वर्ष ही आती है
जब बुराई पर
जीत की
खुशियाँ मनाई जाती हैं
यह पर्व तो
युगों से मनाया जा रहा है
पर क्या
अभी तक कोई
बुराई पर
विजय पा सका है?
बुराई तो
हर पल, हर क्षण
अपना सिर उठाती है
और अच्छाई को
निगल जाती है
बुराई तो
हर रोज दीवाली मनाती है
हमारी दीवाली तो
वर्ष में
बस एक बार ही आती है
तब भी तो
बुराई पुरजोर
अपना सिर उठाती है
अच्छाई की आवाज तो
पटाखों के शोर में ही
दबा जाती है
और किसी को
कहाँ सुनाई देती है
उन बेबस लाचारों की आवाज
जिन की दीवाली
कभी नहीं आती है
उनके अरमानों की होली तो
दीयों की लौ ही
जला जाती है
इसलिये
मुझे ये बात
हज्म नहीं हो पाती है
कि आज की दीवाली
बुराई पर
अच्छाई की जीत है
या
बुराई आज भी
अच्छाई को
मुँह चिढ़ा रही है
मेरी दीवाली तो
तब मनेगी
जब
भूखे-बेबस-लाचारों के
मन की चीत्कार
नहीं दबा पायेगी
कोई ऐसी दीवाली
मेरी दीवाली तो
तब मनेगी
जब हट जायेगी
भ्रष्टाचार एवँ बर्बरता
की बीमारी
इसलिये आओ
हम अपने संकल्प का
एक-एक दीप जलाएँ
दीवाली हो
चाहे न हो
बुराई को
जड़ से मिटाएँ

Thursday, November 08, 2007

झूठा आवरण!

तुमने जो
ओढ़ ली है
खामोशियों की चादर
मैं
चुपचाप सा
ठगा सा
रह गया हूँ
तुम्हारे इस मौन को
कहो क्या समझूँ?
आत्मसमर्पण
या पलायन
जीवन के
सहज व्यापार से?
या अब
तुम्हारे ह्रदय में
कोई तरंग
उठती ही नहीं
या
नहीं होते आलोड़ित
तुम किसी भी विचार से
मान-अभिमान की परिभाषा
अगर तुम समझते
तो
यूं न झूठे आवरण में
जा छुपते
यदि मैंने भी
ओढ़ लिया
अहँ का कवच
तो
मुशिकल हो जायेगा
मेरे लिये ही
उसे भेद पाना
आओ
अपना-अपना आवरण
उतार कर
साथ चलते रहें
शिकायत भी हो तो
करते रहें
और
दो निर्मल नदियों की मानिंद
जीवन सागर में
मिलते रहें!

Wednesday, November 07, 2007

सच्ची तस्वीर!

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
मैंने ख्वाबों में
जो तस्वीर देखी
वो आँख खुलते ही
धुंधला गई
मुझे समझ नहीं आई
जो अक्स
मेरा अंतर्मन बनाता है
वो आँख खुलते ही
क्यों टूट जाता है
शायद यही अंतर है
सच और झूठ में
अमल और सोच में
कुछ पाने के लिये
कर्म तो करना ही पड़ता है
केवल ख्वाब लेने से ही
काम नहीं चलता है
इसलिये उठ
कर्मठ हो कर
कर्म कर
मेहनत से न डर
मुश्किल से न डर
बस कर्म ही कर
कर्म ही कर

Tuesday, November 06, 2007

दगाबाज!

वो चले तो थे

मेरी अंगुली पकड़ कर

बीच राह में

छोड़ गये पर

राह अपनी मिलने पर

दो राहें मिलती हों जहाँ

दो साथी जुड़ें वहाँ


राहें ग़र हों जायें जुदा

तो ये तो जरूरी नहीं

कि साथ चलने वाले भी

हो जायें जुदा

किस्मत ग़र मज़बूर करे

तो वो बात अलग है

खुद-ब-खुद ग़र छोड़े कोई

तो उसका मतलब अलग है

राह पाने की कोशिश में

किसी की

अंगुली पकड़ कर

चल तो पड़े कोई

राह मिलते ही

ग़र छोड़ जाये कोई


तो ऐसे को कोई

क्या नाम दे

वो तो


दगाबाज ही कहाये

फिर

ऐसे को कोई

अपना क्यों बनाये

कहो

अपना क्यों बनाये

Monday, November 05, 2007

कोई कितना गिरे!

किसी के प्यार की खातिर
कोई अपने आप को
कितना गिराये
ये वोही बताए

हम तो रोता हुआ दिल
उनके पास ले कर गये थे
कि शायद
वो चुप कराएँ
कोई इसको क्या समझे
जब वो हमें और रुलायें

ये तो दुनिया का दस्तूर है अब
सब को अपने दिल की
आवाज ही सुनाई देती है
दूसरों का रोना तो
बनावट दिखाई देती है
तो अपनी बात कहो
कोई किसी को कैसे समझाए

जब अपने पाँव के छाले
हमें खुद ही सहलाने हैं
अपने-अपने रास्ते
हमें खुद ही बनाने हैं
तो क्यों किसी के साथ की
कोई चाहत बनाये
और रोते हुए दिल को
बेकार ही और रुलाए
और रुलाता चला जाये
रुलाता चला जाये

Sunday, November 04, 2007

टूटी हुई जिंदगी!

जितनी बार भी

जोड़ना चाहा

इस टूटी हुई जिंदगी को

जिंदगी की लहर के साथ

कोई एक बार फिर

ठोकर मार कर चल दिया

न जाने क्यों

इस दुनिया के लोग

किसी की खुशी देख कर

खुश नहीं होते

क्यों हरेक की राह में

काँटें हैं बोते

बस यहीं से शुरू होती है

भाग-दौड़

और

इक-दूसरे को हराने के लिए

दाँव-पेचों की

तोड़-मरोड़

क्या सोचा है कभी?

क्या इसे ही जिंदगी कहते हैं!

कभी किसी का चैन

कभी किसी की खुशी

छीनने की

लगी रहे हमेशा उधेड़बुन

जिंदगी तो

नाम है जोड़ने का

किसी के दुखों का

रुख मोड़ने का

यहाँ तो जो भी आयेगा

एक दिन तो फनाँ होगा

पर नाम उसी का यहाँ होगा

जो कभी किसी के लिये मिटा होगा!







Thursday, November 01, 2007

क्यों!

क्यों
अपनी मैं को
मैं ही
रहने दिया
कभी
सोचा तुमने
ग़र सोचते
तो मैं का अर्थ
समझ पाते
और समझ जाते
जैसे
दो और दो
चार होते हैं
वैसे
मैं और मैं
मिल कर
हम हो जाते हैं
ग़र इतना अर्थ
समझ पाते
तो
एक-दूसरे से
जुड़ पाते
एक-दूसरे के
हो जाते

जिंदगी का मर्म!

आसमान की
ऊँचाईयों को नापना
इतना आसाँ तो न था
फिर भी
मैंने पत्थर उछाल कर देखा
यह अलग बात है
कि
वो मेरे सिर पर ही
आ गिरा!
समुन्दर की गहराईयाँ भी
तो कुछ कम न थीं
फिर भी
उसमें उतरने की
इच्छा कम न हुई
मुझे तो
हरदम
कोशिश ही करते रहना है
चाहे वो
कामयाब हो
या न हो
यही तो
मेरा धर्म है
यही तो
मेरा कर्म है
और
यही तो
जिंदगी का
मर्म है!

Wednesday, October 31, 2007

फर्ज!

title="चिट्ठाजगत अधिक्रत कड़ी">
चिट्ठाजगत अधिक्रत कड़ी




दो कदम चल कर

राह के पत्थरों से

ग़र ठोकर खाई

तो

हार मान बैठे कोई

जिंदगी से

तो बताओ

इसे क्या नाम दें ?

दो कदम चल कर

दो पत्थरों को

ठोकर मार कर

खुद को

बहादुर मान बैठ कोई

तो कहो

इसे क्या नाम दें?

जिंदगी का नाम

तो चलते जाना है

न ठोकर खा कर

घबराना है

और

न थोड़ी सी कामयाबी से

सिर उठाना है

इंसा तो वही है

जिसे हर हाल में

इन्सानियत का

फर्ज निभाना है!

Tuesday, October 30, 2007

कद!

title="चिट्ठाजगत अधिक्रत कड़ी">
चिट्ठाजगत अधिक्रत कड़ी



मैं अपने स्थान पर खड़ा हो
अपना कद नापने की
कोशिश में लगा रहा
इस कोशिश में
मैं यह भी न देख पाया
कि मेरे आसपास के लोगों का कद
मेरे से ऊँचा उठता जा रहा है
और मैं शनै: शनै:
बोना होता जा रहा हूँ
शायद मैं अपनी ही नज़र में
खुद को पहचान पाना
भूल गया हूँ
जब नज़र उठा कर देखा
तो मैंने खुद को
अपनी ही नज़र में
बौना पाया
अपना कद जब
दूसरों की मानिंद
छोटा पाया
तो ही
खुद को खुद की नज़र से
पहचान पाया!

Saturday, October 27, 2007

कल क्या होगा!
सावन में बरसात न देखी, बिन मौसम बादल गरजें,
कौन है जाने कल क्या होगा, सोच के तू क्यों है पागल।
कौन मिलेगा इन राहों में, सब कुछ पहले से तय है,
जीवन की मुश्किल राहों को, करना फिर भी तो तय है ।
करते जाओ कर्म को अपने, हँस के करो या रो के करो,
सोच-सोच के फल की बाबत, आगे बढ़ने से न डरो ।
इस झूठी दुनिया में मुश्किल सच्चे लोगों का मिलना,
छोड़ो दुनिया के लोगों की, तुम तो सच्चे ही रहना ।
बात पते की कहता हूँ मैं, सुनना चाहे ना सुनना,
दौड़ है अंधी जीवन की पर, खाली हाथ ही तो मरना।

Monday, October 08, 2007

शून्य
हर दिन,
हर पल,
निराशाओं का शून्य
निगल जाता है
मेरी आशा का
इक और सूरज!
और व्यथित सा मेरा मन
उद्विग्न हो,
कल्पना में,
ढूँढता ही रह जाता है
शून्य में
प्रफुल्लता का
एक पल!
और दिन-प्रतिदिन
बढ़ता ही जाता है आकार
इस शून्य का!
और मुझे इन्तज़ार है
उस दिन का
जब लील जायेगा
मुझे ये शून्य्…!
और मेरी आशाएँ-निराशाएँ
इक-दूसरे में विलीन हो
मुक्त कर देंगी मुझे
और मैं स्वछन्द हो
विचरूँगा
शून्य में ही!!

Thursday, October 04, 2007

एक यथार्थवादी गीत
कितने करीब जिंदगी के मौत खड़ी है,
फिर भी हरेक शख्स को अपनी ही पड़ी है !
चंद लम्हों की साँसों ने है तूफान उठाया,
हर बात पर बेकार बड़ा शोर मचाया,
हुई चलने की बेला तो खामोश घड़ी है !
तेरी-मेरी करता रहा तमाम उम्र भर,
भरता रहा तिजोरी तमाम उम्र भर,
अंत समय झोली पर खाली ही पड़ी है !
नंगी जलाई लाशें, कफनों का करके सौदा,
अपना है या पराया, कुछ भी न तूने सोचा,
तू भी बनेगा मट्टी, अंजाम यही है !
मालूम है सभी को, इक रोज़ सब को जाना,
दो दिन का दाना-पानी, चंद रोज़ का ठिकाना,
कोई नहीं ये समझा, सच तो यही है !
कितने करीब जिंदगी के मौत खड़ी है,
फिर भी हरेक शख्स को अपनी ही पड़ी है !

Friday, September 28, 2007

क्यों
क्यों है खामोश आज ये बस्ती?
और आसमान भी
क्यों शोकाकुल है?
ढ़लते सूरज की बेला में
क्यों है आकाश इतना रक्तरंजित?
क्या किसी निरीह के
खून के धब्बे
आसमान को स्याह किये दे रहे हैं?
या फिर,
लाल है आसमान आज इतना
किसी के अरमानों की
जलती चिता की
उठती हुई लपटों से!
लगता है शायद
ख़ुदा और भगवान
लड़ते-लड़ते
दम तोड़ चुके हैं!
और धर्म के ठेकेदार
सेंक रहे हैं हाथ,
उनकी जलती चिताओं से!

Friday, September 21, 2007

अपने-पराए
जब
विश्वास ही
अपने न हुए
तो
अविशवासों का
जिक्र क्या करूँ!

सडांध
अपने बदन का मैल तो
मैं साफ कर लूँगा धो कर
अपने सड़े हुए अंग को भी
अलग कर सकता हूँ
अपने शरीर से
पर मस्तिष्क की सडांध
का क्या करूँ??
न तो धो सकता इसे
और न ही यह
किसी आप्रेशन से
अलग हो सकती है
बस इस सडाँध से
मैं कर सकता हूँ
कोरे पन्ने ही
काले-पीले
जिससे तुम्हे
कुछ तो आभास हो
मन की सडांध का !

Thursday, September 20, 2007

भटकन
मैं
पथिक था
एक भटका हुआ!
तुमने भी तो
राह न दिखाई मुझे
बस
मेरी अँगुली पकड़ कर
चल दिये मेरे साथ
और
स्वयँ भी भटक गये
मेरी/अपनी/उसकी/सबकी
उलझाई भूल-भुलैया में
तुम्हारी भटकन देख
मैंने तो
राह पा ली
तुम तो भटकते ही रहे
तुम्हे लगी
भटकन ही प्यारी!