"अंतर"
तुम्हारी
और
मेरी सोच में
केवल
इतना अंतर है
तुम
जीवन टुकड़ों में
जीते हो
मैं
समग्रता में
तुम
संबंध
मतलब के
रखते हो
मैं
अंतरंगता के
निःस्वार्थ
तुम
केवल
अभी की
सोचते हो
मैं दूर की
यदि ये सब
भागम-भाग
तोड़-फोड़
धोखा-धड़ी
तुम
केवल
अर्थ के लिये
करते हो तो
अर्थ तो
वेश्या के पास भी
होता है
पर क्या
उसके पास
कोई समाज है?
रिश्ता है?
अपना है?
तुम तो
उससे भी
बदतर स्थिति में
प्रतीत होते हो
जो निज-स्वार्थ की खातिर
कुछ भी कर गुजरने को
तत्पर रहते हो
वेश्या की तो
अपनी मजबूरी है
तुम्हारी
क्या मजबूरी है?
केवल हवस की
या स्वार्थ
या फिर
तुम्हारी यही
फितरत है
कभी
स्वयँ से
पूछ कर देखो
तो तुम्हें
मन के आईने में
अपना प्रतिबिम्ब दिखाई देगा
और अपनी नग्नता देख
तुम स्वयँ से ही
घृणा करने लगोगे
फिर दूसरे तो
तुम्हारे क्या होंगे
तुम स्वयँ भी
अपने नहीं रहोगे




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"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.
5 Comments:
उम्दा कविता.......
प्यारी कविता.........
इस कविता का अभिनन्दन।
गहन भाव लिए सुन्दर रचना!
चड्डा साहब आप ने मेरे दिल ओर दिमाग की बात कह दी है....
वेश्या के पास भी
होता है
पर क्या
उसके पास
कोई समाज है?
रिश्ता है?
अपना है?
तुम तो
उससे भी
बदतर स्थिति में
प्रतीत होते हो
जो निज-स्वार्थ की खातिर
कुछ भी कर गुजरने को
तत्पर रहते हो
वेश्या की तो
अपनी मजबूरी है
तुम्हारी
क्या मजबूरी है?
लेकिन इस का जबाब उन के पास नही वक्त देगा उन्हे इस बात का जबाब
आप का धन्यवाद
वाह !! कितना सही कहा आपने.....वाह वाह वाह !!!
यह यदि मन से समझ ले व्यक्ति तो फिर समस्या ही क्या रह जायेगी....
बहुत ही सुन्दर भावना , चिंतन और अभिव्यक्ति...
SUNDAR RACHNA HAI ... GAHRE RASAHSYON KO SULJHAATI .. GAZAB KI ABHIVYAKTI HAI ...
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