गतांक से
"मौत पर कुछ कविताएँ"
(4)
"छलता यथार्थ"
ऐ मौत
तू कहीं
छलावा तो नहीं
जो
जीवन के
हर पल को
अपनी धुंध से घेरे
डराती रहती है
तुझे तो
मैंने
एक यथार्थ की
संज्ञा दी थी
परन्तु
यह कैसा यथार्थ है
जो परत-दर-परत
जीवन के
अनसुलझे
रहस्यों में छिपा है
जिसे
न मैं देख पाता हूँ
न भोग पाता हूँ
और
न ही
महसूस कर पाता हूँ
न जाने
कैसा लगेगा
तुझसे मिल कर
समझ नहीं पाता हूँ
परन्तु
फिर भी
तेरा छलता सा यथार्थ
कभी न भूल पाता हूँ !
कभी न भूल पाता हूँ !!




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"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.
7 Comments:
इसी से तो सब घूमे हैं..छलना ही मानो कि कब न आ जाये. बढ़िया.
bahut khoob
bahut khoob
bahut khoob
बहुत अच्छा लिखा है
ek se badhkar ek kavita ...
aaj maine aapki saari kavitaayen padhin
dhnyata ka anubhav hua
sachmuch aapki lekhni me voh baat hai jo kisi bhi baat ko shabdon me saleeke se dhaalkar abhivyakt kar sakti hai
abhinandan !
badhhai !
ऐ मौत
तू कहीं
छलावा तो नहीं
जो
जीवन के
हर पल को
अपनी धुंध से घेरे
डराती रहती है
बहुत खूउउब ....!!
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