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Tuesday, July 14, 2009

गतांक से

"मौत पर कुछ कविताएँ"

(4)

"छलता यथार्थ"

ऐ मौत
तू कहीं
छलावा तो नहीं
जो
जीवन के
हर पल को
अपनी धुंध से घेरे
डराती रहती है
तुझे तो
मैंने
एक यथार्थ की
संज्ञा दी थी
परन्तु
यह कैसा यथार्थ है
जो परत-दर-परत
जीवन के
अनसुलझे
रहस्यों में छिपा है
जिसे
न मैं देख पाता हूँ
न भोग पाता हूँ
और
न ही
महसूस कर पाता हूँ
न जाने
कैसा लगेगा
तुझसे मिल कर
समझ नहीं पाता हूँ
परन्तु
फिर भी
तेरा छलता सा यथार्थ
कभी न भूल पाता हूँ !
कभी न भूल पाता हूँ !!

7 Comments:

Blogger Udan Tashtari said...

इसी से तो सब घूमे हैं..छलना ही मानो कि कब न आ जाये. बढ़िया.

3:34 PM  
Blogger चन्दन कुमार said...

bahut khoob

3:51 PM  
Blogger चन्दन कुमार said...

bahut khoob

3:51 PM  
Blogger चन्दन कुमार said...

bahut khoob

3:51 PM  
Blogger अनिल कान्त : said...

बहुत अच्छा लिखा है

4:22 PM  
Blogger AlbelaKhatri.com said...

ek se badhkar ek kavita ...
aaj maine aapki saari kavitaayen padhin

dhnyata ka anubhav hua

sachmuch aapki lekhni me voh baat hai jo kisi bhi baat ko shabdon me saleeke se dhaalkar abhivyakt kar sakti hai

abhinandan !
badhhai !

4:30 PM  
Blogger Harkirat Haqeer said...

ऐ मौत
तू कहीं
छलावा तो नहीं
जो
जीवन के
हर पल को
अपनी धुंध से घेरे
डराती रहती है

बहुत खूउउब ....!!

10:25 PM  

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