कभी कभी सोचता हूँ
क्या पापियों के पाप
बिना प्रायश्चित ही
धुल जाते हैं
और फिर पापियों को
और पाप करने की
राह दिखलाते हैं
यदि हाँ
तो इन पापियों के पाप
बिना प्रायश्चित ही
क्यों धो डालती है गंगा
क्या ये भी पाप नहीं है
मन सहजता से
इस बात को
स्वीकार नहीं कर पाता है
तभी तो
सवाल उठाता है
कि दुनिया में
दिन-ब-दिन
पाप क्यों बढ़ते जा रहे हैं
और
उत्तर पाता है
कि जब पापियों के पाप
यूँ ही
बिना अन्त:करण को धोये
धुल जाते हैं
तो स्वत: ही
और पाप करने की
प्रेरणा पाते हैं
अंतत: पाप
बढ़ते ही जाते हैं…
बढ़ते ही जाते हैं…
1 Comments:
एक निष्पाप अभिव्यक्ति।
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