"बात कहने से कौन डरता है !"
बात कहने से कौन डरता है,
सच को लेकिन कहाँ वो सुनता है !
हम वो शायर नहीं हैं दुनिया में,
देख चेहरा जो बात कहता है !
अब तो दस्तूर है जमाने का,
सिर्फ मतलब से दोस्त बनता है !
कौन चाहे उसे जमाने में,
जो आईना हाथ में रखता है !
रिश्ते-नाते हैं सारे बेमानी,
मन से मन जब न मिलता है !




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"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.
2 Comments:
अनिल जी बधाई...आपकी रचना के भाव बहुत अच्छे हैं...अगर बुरा ना माने तो एक बात कहूँ ...मेरे हिसाब से इस रचना में एक दोष है इसलिए इसे ग़ज़ल के निर्धारित माप डंडों के अनुसार नहीं कहा जा सकता...आपने रदीफ़ "है" का निर्वाह तो किया लेकिन जो काफिये चुने हैं डरता सुनता कहता बनता वो सही नहीं हैं...क्यूँ की इसमें ता मूल शब्द नहीं है मूल शब्द हैं डर, सुन, कह,बन आदि...इन मूल स्वरों की तुक काफिये में एक होनी चाहिए....जैसे डरता के साथ करता मरता हरता भरता...आदि या फिर आप डराता कहाता सुनाता बनाता को काफिये के तौर पर ले सकते थे...इस में आ की मात्र के साथ ता की तुक मिल जाती..ग़ज़ल में काफिये और रदीफ़ के रख रखाव की बात होनी जरूरी होती है....लिखते रहिये...
नीरज
नीरजजी !
गज़ल आपको पसन्द, आई उसका शुक्रिया ।
जहाँ तक काफिये की बात है, मैंने उसका नियमोंनुसार पूरा-पूरा निर्वाह करने की को कोशिश की है । मेरे विचार से मैं आ मात्रा के काफिये का निर्वाह किया है जो डरता, सुनता, कहता, बनता, मिलता इत्यादि में हैं । मेरी बात की पुष्टि http://kavita.hindyugm.com/2008/02/8.html पर दिये गये पाठ से भी होती है । यदि आप कुछ और भी नियम मुझे बता सकें जिससे मेरी रचनाओं में पैनापन आ सके तो कृपा होगी ।
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