बदला!
मैंने तुमसे
अपने एहसानात का
हिसाब तो नहीं माँगा था
फिर क्यों
नज़रें चुराते
फिर रहे हो मुझसे?
क्या दुनिया का
दस्तूर निभा रहे हो?
दस्तूर -
बेवफाई का
दस्तूर -
काम निकल जाने पर
अंगूठा दिखलाई का
या फिर
औरों की तरह
तुम्हारी भी
ये फितरत ही है
मैंने तो
जो किया
रिश्तों की,
इन्सानियत की
खातिर किया
या फिर
यूं समझो
जो मुझे उचित लगा
वो ही किया
तुम क्यों
बेकार ही
डरने लगे मुझसे
कि शायद
तुम्हे कुछ
लौटाना न पड़ जाये मुझे
समझ नहीं पाया हूँ मैं
तुम
तकलीफ से
डरते हो
या फिर
स्वार्थपरता के
जाल में उलझे हो
कुछ भी हो
कभी न कभी तो
तुम्हे तुम्हारी
कमी का
ख्याल आयेगा ही
ग़र ऐसा हो तो
मुझे मेरे
एहसानात का
बदला स्वयँ ही
मिल जायेगा!
सभी कुछ
स्वयँ ही मिल जायेगा!!






1 Comments:
बेहद खूबसूरत रचना. बधाई.
नीरज
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