अपनी खुशी!
अपनी खुशी
ढूँढने
निकला था
जग में मैं
पर चहूँ और
दिखाई दिया
दुख ही दुख
कोई
भूख से दुखी
तो कोई
न खा सकने से दुखी
कोई
गरीबी से बेहाल
तो कोई
पैसा नहीं
सकता संभाल
कोई
किसी को
पाने की चाह में
कोई
किसी को पा कर
खोने की राह में
तो फिर
खुशी है कहाँ
ग़र दुखी है
सारा ही जहाँ
सोच में
पड़ गया मैं
पर
सोचने की
क्या ज़रूरत थी
जिस खुशी के लिये
भागता रहा
ता-ज़िंदगी
इधर-उधर
वो तो
अपने ही
भीतर थी बसी
बस उसे
थोड़ा सा
टटोलने की
थोड़ा सा
कुरेदने की
ज़रूरत थी !






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