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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

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"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

Thursday, June 19, 2008

फिर से जी जाता हूँ मैं !

ढंग से जीने के लिये
अनगिनित मौत मरा हूँ मैं
फिर भी
ढंग से जी नहीं पाया हूँ मैं
ज़ख्मों को खुरचते-खुरचते
दर्द सहने की
आदत सी पड़ चुकी है
फिर भी
ज़ख्म भूल नहीं पाया हूँ मैं
कौन जाने
कब कोई किस वक्त
एक और नया ज़ख्म दे जाये
और मैं फिर से
तड़प उठूँ अंदर तक
हाँ, इतना अवश्य है कि
नया ज़ख्म पुराने ज़ख्म को
भुला जाता है
पर एक नया दर्द दे जाता है
और उस दर्द को सहने में
फिर से नई कोशिश में
लग जाता हूँ मैं
और यूँ ही
इक और मौत मर के
फिर से जी जाता हूँ मैं
इक और मौत मरने को !

3 Comments:

Blogger jasvir saurana said...

bhut hi sundar rachana.likhate rhe.

9:56 PM  
Blogger Udan Tashtari said...

इक और मौत मर के
फिर से जी जाता हूँ मैं
इक और मौत मरने को !

--गहरी रचना.

3:29 AM  
Blogger डॉ० अनिल चड्डा said...

समीर एवं जसवीर जी,

कविता पसंद आने का बहुत-बहुत शुक्रिया ।

8:44 PM  

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