समझ नहीं पाता हूँ !
समझ नहीँ पाता हूँ
किस-किस को
कितनी-कितनी बार
माफ करूँ मैं
या फिर
हर बार ही
हिसाब साफ करूँ मैं
समझ नहीं पाता हूँ
क्या
लोगों की गल्तियाँ
दरनिकार करना
मेरी मज़बूरी है
या फिर
फितरत है मेरी
हो सकता है
गल्ती की
प्रतिक्रिया में
गल्ती करना
सुहाता न हो मुझे
और मैं
अनजाने ही
दूसरों की गल्तियाँ
माफ कर बैठता हूँ
पर
इससे क्या
मैं उसको
बढ़ावा नहीं दे जाता हूँ
और
वो फिर से
एक और गल्ती
कर जाता है
और मैं
फिर से
स्वयँ को
अवश ही पाता हूँ
प्रतिक्रिया करने में
यूँ
ये सब बढ़ता ही जाता है
अब तुम्ही कहो
ऐसे में
मैं क्या करूँ
मूक रह कर
अवशता ही दर्शाऊँ
या फिर
चुपचाप
किनारा ही कर लूँ !
ताकि
बार-बार
ऐसी अवस्था का
सामना न करना पड़े !!






2 Comments:
अनिल जी
बहुत ही सहज और सुन्दर अभिव्यक्ति है। अच्छा लगा पढ़ना ।
धन्यवाद शोभा जी ।
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