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"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

Monday, June 25, 2007

सिलसिला


काँटों से
बचने को
पहने था जूते मैं
पर
क्या करूँ
जब जूते ही
काटने लगें मुझे
सो
नंगे पाँव ही चल दिया मैं
इन पथरीले
कंटीले रास्तों पर
और
सहलाता रहा स्वयँ ही
अपने पाँवों के छाले
सहलाने पड़ते हैं

सभी को तो
अपने-अपने पाँवों के छाले
फिर
मैंने ही क्यों
लेना चाहा सहारा
दूसरों की सहानुभूति का
मरहम ग़र कोई
लगा भी दे तो
चुकानी पड़ती है
कीमत उसकी
पाँवों के छाले तो
भर भी जायेंगें
दिल के छाले तो
रिसते ही रहेंगें
रिसते ही रहेंगें
और
मेरे ख़ून में
भर जायेंगें
एक ऐसा ज़हर
जो बना जायेगा
मेरे दिल को
एक ऐसा
ज़हर बुझा नश्तर
जो
दूसरों को
ज़ख्म देता ही रहेगा
देता ही रहेगा
और
यह सिलसिला
चलता ही रहेगा!
चलता ही रहेगा!!





3 Comments:

Blogger Pramod said...

Anilji, first of all I am sorry for not writing in devnagri. I don't have fonts on my computer. Aapki kavita ne mere dil ko choo liya. Wakayee mere saath bhi kuch aisa hee ghata hai aur laga jaise aapne yeh kavita mere liyae hee lihkee hai. Aasha hai aur bhi sunder kavitayan padne ko milengee.

6:20 PM  
Blogger सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव said...

बहुत ही अच्छी कविता। जिंदगी की गहरी सच्चाई को उजागर किया है आपने

9:01 PM  
Blogger Mired Mirage said...

बहुत अच्छी कविता और बहुत अच्छी तुलना ।
घुघूती बासूती

9:02 PM  

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