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कुछ तो मैं कह बैठा हूँ, अभी बहुत कुछ बाकी है,

कागज-कलम हैं मीत मेरे, शब्द ही दिल के साकी हैं !

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"मेरी अभिव्यक्तियों में सूक्ष्म बिंदु से अन्तरिक्ष की अनन्त गहराईयों तक का सार छुपा है इनमें एक बेबस का अनकहा, अनचाहा प्यार छुपा है " -डा0 अनिल चडडा All the content of this blog is Copyright of Dr.Anil Chadah and any copying, reproduction,publishing etc. without the specific permission of Dr.Anil Chadah would be deemed to be violation of Copyright Act.

Friday, August 31, 2007

"फिर भी मैं बहुत अकेला था!"
फूटा था मैं अंकुर बन कर,
एक नवप्रभात की चाह लिये,
धरती के बंधन तोड़ सभी,
स्वच्छन्द विचरण की चाह लिये ।
कुछ-कुछ था भला लगा मुझको,
सूरज की किरणें थीं लगीं भली ,
दिन जैसे-जैसे चढ़ता गया,
था लगा कि जैसे आग जली ।
सिर छुपा लिया मैंने डर कर,
अपनी जननी की गोद में था,
जब रात अंधेरी गहराई,
मैं सोया मीठी नींद में था ।
अगले दिन वैसा ही होना था,
कुछ पाना था, कुछ खोना था,
हँसने को, खुशियाँ पाने को,
मुझको थोड़ा तो रोना था ।
मेरी जननी मेरा सम्बल थी,
जड़ को उसने मेरी सींचा था,
पर फैला, आसमान छूना,
मैंने उससे ही सीखा था ।
कद जैसे-जैसे बढ़ता गया,
जड़ गहरी मेरी होती गई,
पर ऊँचाईयों के साथ-साथ,
धरती से दूरी बढ़ती गई ।
इतना ऊँचा, इतना फैला था
व्रक्ष मेरी आकांक्षा का,
सब पाने को स्वयँ भार से ही,
था झुका लिया सबसे नीचा ।
कुछ सत्य-बोध, कुछ ज्ञान-बोध,
भीतर ही भीतर मैं टूटा था,
था जुड़ा अभी तक जिससे मैं,
सब नकली था, सब झूठा था ।
जीवन की अंधी दौड़ में,
मैंने मुझको ही जकड़ा था,
इस भीड़-भाड़ के दौर में,
अपना ही पथ मैं भटका था ।
उठते-गिरते, रुकते-चलते,
मैं उस पड़ाव पर पहुँचा था,
सब अपना था, सब मेरा था,
फिर भी मैं बहुत अकेला था ।

1 Comments:

Blogger Nishikant Tiwari said...

दिल की कलम से
नाम आसमान पर लिख देंगे कसम से
गिराएंगे मिलकर बिजलियाँ
लिख लेख कविता कहानियाँ
हिन्दी छा जाए ऐसे
दुनियावाले दबालें दाँतो तले उगलियाँ ।
NishikantWorld

4:54 PM  

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